नई दिल्ली। भारत की अर्थव्यवस्था (Economy of India) इस समय कई वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रही है। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, रुपये की कमजोरी और विदेशी निवेश में गिरावट ने देश के भुगतान संतुलन (Balance of Payments) पर दबाव बढ़ा दिया है। मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने चेतावनी दी है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव भारत के लिए “भुगतान संतुलन की वास्तविक परीक्षा” बन सकता है।
सीईए के मुताबिक भारत फिलहाल तीन प्रमुख आर्थिक दबावों से जूझ रहा है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल, सोना और खाद जैसी जरूरी वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए वैश्विक महंगाई का सीधा असर देश पर पड़ रहा है।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) भारतीय शेयर बाजार से लगातार पैसा निकाल रहे हैं। इससे बाजार में डॉलर की मांग बढ़ रही है और रुपये पर दबाव बन रहा है।
देश का आयात बिल लगातार बढ़ रहा है, जबकि निर्यात उतनी तेजी से नहीं बढ़ पा रहा। इससे व्यापार घाटा बढ़ रहा है और भुगतान संतुलन कमजोर हो सकता है।
भुगतान संतुलन यानी बैलेंस ऑफ पेमेंट (BoP) किसी देश का विदेशी लेनदेन का पूरा हिसाब होता है। इससे पता चलता है कि देश में विदेशों से कितना पैसा आया और कितना बाहर गया।
विदेशी मुद्रा देश में मुख्य रूप से निर्यात, विदेशी निवेश और एनआरआई द्वारा भेजे गए पैसे से आती है। वहीं, तेल, मशीनरी, सोना और अन्य वस्तुओं के आयात, विदेश यात्रा और पढ़ाई पर खर्च के जरिए पैसा बाहर जाता है।
अगर बाहर जाने वाला पैसा ज्यादा हो जाए, तो अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने लगता है।
रुपये की कमजोरी और तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस पर पड़ सकता है।
ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ने से सब्जियां, दूध, खाद्य पदार्थ और अन्य जरूरी सामान भी महंगे हो सकते हैं।
डॉलर मजबूत होने पर मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और विदेश से आने वाले अन्य उत्पादों की कीमतें बढ़ सकती हैं।
सीईए ने कहा कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और तेल आपूर्ति पर असर ने हालात को गंभीर बना दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा की आशंका के कारण तेल कीमतों में तेज उछाल देखा जा रहा है।
भारत अपनी जरूरत का करीब 87 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है और इसका बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। इसके अलावा देश में इस्तेमाल होने वाली एलपीजी का अधिकांश भाग भी आयातित है। यही वजह है कि वहां का कोई भी संकट सीधे भारत की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर असर डालता है।
हालांकि सरकार का कहना है कि भारत पहले की तुलना में ज्यादा मजबूत स्थिति में है। देश का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 701 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, जो बाहरी झटकों से निपटने में मदद कर सकता है।
सरकार का दावा है कि बुनियादी ढांचे में निवेश, आर्थिक सुधार और मजबूत बैंकिंग व्यवस्था भारत को वैश्विक आर्थिक दबावों का सामना करने में सहारा देंगे।
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