नई दिल्ली। राजस्थान हाईकोर्ट (Rajasthan High Court) ने अट्टा-सट्टा प्रथा और बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि परंपरा के नाम पर महिलाओं और बच्चियों की गरिमा तथा स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया जा सकता। अदालत ने साफ कहा कि बेटियां किसी सामाजिक लेन-देन का हिस्सा नहीं हैं और ऐसी प्रथाएं संविधान तथा कानून की भावना के खिलाफ हैं।
जस्टिस अरूण मोंगा और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने बीकानेर की एक महिला की अपील स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट के पुराने आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही महिला को पति से तलाक देने की अनुमति भी दे दी।
इससे पहले फैमिली कोर्ट ने तलाक की याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट का मानना था कि वैवाहिक विवाद की जड़ अट्टा-सट्टा प्रथा के तहत जुड़े दूसरे परिवार का विवाद था और महिला ने खुद अपनी इच्छा से ससुराल छोड़ा था।
महिला ने हाईकोर्ट में कहा कि शादी के बाद से उसे लगातार दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया। ससुराल पक्ष मोटरसाइकिल और सोने के आभूषणों की मांग करता था। उसने मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न के आरोप भी लगाए।
महिला का कहना था कि उसे उसकी बच्ची समेत घर से निकाल दिया गया। मामले में महिला थाना बीकानेर में एफआईआर दर्ज हुई थी, जिसके बाद पति और उसके पिता के खिलाफ आईपीसी की विभिन्न धाराओं में चार्जशीट भी पेश की गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने अट्टा-सट्टा प्रथा से जुड़े पारिवारिक विवाद और पति-पत्नी के बीच क्रूरता के आरोपों को गलत तरीके से एक-दूसरे से जोड़ दिया।
खंडपीठ ने कहा कि केवल इस आधार पर कि महिला लंबे समय तक ससुराल में रही, यह नहीं माना जा सकता कि उसके साथ कोई अत्याचार नहीं हुआ। कई महिलाएं सामाजिक दबाव, आर्थिक निर्भरता, बच्चों की जिम्मेदारी और पारिवारिक परिस्थितियों के कारण प्रताड़ना सहने के बावजूद वैवाहिक घर छोड़ नहीं पातीं।
अदालत ने अट्टा-सट्टा प्रथा को “मानव जीवन के लेन-देन” जैसा बताया। कोर्ट ने कहा कि इस व्यवस्था में लड़कियों की इच्छा और अधिकारों की अनदेखी की जाती है। यदि एक विवाह में विवाद होता है तो उसका असर दूसरे विवाह पर भी डाला जाता है, जिससे महिलाओं पर अतिरिक्त मानसिक और सामाजिक दबाव बनता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि बालिकाओं को ऐसी प्रथाओं में बांधना न केवल कानून के खिलाफ है, बल्कि यह महिला गरिमा और बाल अधिकारों का भी उल्लंघन है।
अंत में हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश निरस्त करते हुए विवाह विच्छेद की डिक्री जारी करने के निर्देश दिए। अदालत के इस फैसले को महिला अधिकारों और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ एक महत्वपूर्ण टिप्पणी माना जा रहा है।
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