तेहरान। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन (Masoud Pezeshkian) ने एक बार फिर साफ किया है कि ईरान युद्ध नहीं बल्कि कूटनीति और संवाद के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहता है। लगातार बढ़ते तनाव और पश्चिमी देशों की चेतावनियों के बीच ईरानी राष्ट्रपति ने कहा कि उनका देश अब भी बातचीत और शांतिपूर्ण समाधान के लिए तैयार है।
सोशल मीडिया पर जारी अपने बयान में पेजेशकियन ने कहा कि ईरान ने हमेशा अपने अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का सम्मान किया है और संघर्ष से बचने के लिए हर संभव प्रयास किए हैं। उन्होंने कहा कि सभी कूटनीतिक विकल्प अभी भी खुले हुए हैं और सम्मानजनक बातचीत ही स्थायी समाधान का रास्ता हो सकती है।
ईरानी राष्ट्रपति ने बिना किसी देश का नाम लिए कहा कि किसी भी राष्ट्र को ताकत या दबाव से झुकाने की सोच गलत है। उनके मुताबिक ऐसी नीतियां लंबे समय तक टिकाऊ शांति नहीं ला सकतीं। उन्होंने कहा कि आपसी सम्मान और संतुलित कूटनीति ही क्षेत्र में स्थिरता कायम कर सकती है।
उधर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान को लेकर तीखे बयान दिए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप ने दावा किया कि ईरान की सैन्य ताकत काफी कमजोर हो चुकी है। उन्होंने कहा कि अब सवाल यह है कि क्या स्थिति को पूरी तरह खत्म किया जाए या किसी समझौते की दिशा में बढ़ा जाए।
व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि वह बड़े युद्ध के बजाय सीमित तनाव और कम जनहानि वाला रास्ता पसंद करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल अमेरिका ईरान को “एक मौका” देना चाहता है और किसी जल्दबाजी में नहीं है।
Strait of Hormuz को लेकर तनाव अभी भी दुनिया के लिए सबसे बड़ी चिंता बना हुआ है। वैश्विक तेल सप्लाई का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। ईरान द्वारा इस मार्ग को ब्लॉक किए जाने के बाद दुनिया भर में ऊर्जा संकट और तेल कीमतों को लेकर चिंता बढ़ गई है।
रिपोर्ट्स के अनुसार अमेरिका और इस्राइल के साथ बढ़ते संघर्ष के बाद पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शांति वार्ता कराने की कोशिश हुई थी, लेकिन बातचीत किसी नतीजे तक नहीं पहुंच सकी। फिलहाल क्षेत्र में बेहद नाजुक युद्धविराम लागू है।
ट्रंप ने खुद माना है कि यह संघर्षविराम स्थायी नहीं माना जा सकता। वहीं ईरान ने भी चेतावनी दी है कि अगर दोबारा युद्ध शुरू हुआ तो अमेरिका और उसके सहयोगियों को पहले से कहीं ज्यादा बड़े जवाब का सामना करना पड़ सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि भारी आर्थिक प्रतिबंधों और बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद ईरान फिलहाल खुद को बातचीत के पक्षधर देश के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर अमेरिका भी सैन्य दबाव बनाए रखते हुए सीमित समझौते की संभावना खुली रखना चाहता है।
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