
नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा (Hindi Cinema) में रोमांटिक फिल्मों (Romantic Films) की एक लंबी परंपरा रही है, जहां प्रेम कहानियों (Love Stories) ने दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई है। लेकिन हर नई कोशिश उसी स्तर को छू पाए, यह जरूरी नहीं होता। लक्ष्य और अनन्या पांडे (Ananya Panday) की नई फिल्म ‘चांद मेरा दिल (Chand Mera Dil)’ भी ऐसी ही एक कोशिश है, जो बड़े पर्दे पर एक प्रेम कहानी पेश करने के इरादे से आई थी, लेकिन अपनी प्रस्तुति और लेखन के कारण यह उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाती।
फिल्म की कहानी आरव रावत और चांदनी प्रसाद के इर्द-गिर्द घूमती है, जो कॉलेज के दिनों में एक-दूसरे से मिलते हैं और धीरे-धीरे उनके बीच प्यार पनपता है। दोनों की दुनिया अलग-अलग है और पारिवारिक परिस्थितियां भी उनके रिश्ते को आसान नहीं बनने देतीं। एक तरफ जहां आरव का परिवार सामाजिक छवि और अपेक्षाओं के दबाव में जीता है, वहीं चांदनी का जीवन घरेलू संघर्षों और भावनात्मक असुरक्षा के बीच बीता है। ऐसे माहौल में दोनों एक-दूसरे को सहारा बनाते हैं और अपने रिश्ते को आगे बढ़ाने की कोशिश करते हैं।
कहानी में आगे चलकर एक ऐसा मोड़ आता है जो दोनों की जिंदगी को पूरी तरह बदल देता है। यह वही बिंदु है जहां फिल्म एक मजबूत भावनात्मक जुड़ाव बना सकती थी, लेकिन यहीं पर इसकी रफ्तार और पकड़ कमजोर पड़ जाती है। पटकथा में गहराई की कमी साफ महसूस होती है और घटनाएं अनुमानित लगने लगती हैं। दर्शक कहानी के अगले कदम को पहले ही समझ लेते हैं, जिससे रोमांच और उत्सुकता धीरे-धीरे कम हो जाती है।
लक्ष्य ने अपने किरदार आरव को ईमानदारी से निभाने की कोशिश की है और उनकी परफॉर्मेंस में परिपक्वता दिखाई देती है। वहीं अनन्या पांडे ने चांदनी के किरदार में भावनाओं को व्यक्त करने का प्रयास किया है, लेकिन किरदार की लेखन शैली उसे सीमित कर देती है। दोनों कलाकारों के बीच स्क्रीन पर केमिस्ट्री मौजूद है, लेकिन कमजोर कहानी उसे प्रभावी बनने का पर्याप्त अवसर नहीं देती।
फिल्म का सबसे कमजोर पहलू इसका लेखन और संवाद माने जा सकते हैं। कई जगहों पर संवाद कृत्रिम और पुराने अंदाज के लगते हैं, जो आज के समय के दर्शकों से जुड़ने में कठिनाई पैदा करते हैं। कहानी की गति भी असमान रहती है, जिससे बीच-बीच में फिल्म लंबी और खिंची हुई महसूस होती है। कुछ भावनात्मक दृश्य असर डालने की कोशिश करते हैं, लेकिन सही तैयारी और निर्माण के अभाव में उनका प्रभाव सीमित रह जाता है।
तकनीकी पक्ष की बात करें तो फिल्म का संगीत और कुछ दृश्य अपेक्षाकृत बेहतर लगते हैं, जो कहानी को थोड़ी राहत देते हैं। लेकिन यह तत्व पूरी फिल्म को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं हो पाते। दर्शक शुरुआत से अंत तक एक मजबूत कहानी की उम्मीद करते हैं, लेकिन फिल्म उस उम्मीद को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाती।
कुल मिलाकर ‘चांद मेरा दिल’ एक ऐसी प्रेम कहानी बनकर रह जाती है, जो विचार में तो आकर्षक लगती है लेकिन पर्दे पर उसका प्रभाव वैसा नहीं बन पाता। यह फिल्म दर्शकों के लिए एक लंबा अनुभव साबित होती है, जिसमें भावनाएं हैं लेकिन असरदार कहानी का अभाव साफ नजर आता है।
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