
नई दिल्ली। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने देश की अर्थव्यवस्था को लेकर महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि भारत में कुछ लोग डर फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें ऐसा करने की बजाय लोगों में विश्वास जगाना चाहिए। वित्त मंत्री ने पश्चिम एशिया संकट के बीच अपनी उपलब्धियों को कम आंकने वालों पर भी टिप्पणी की।
सीतारमण ने मुंबई में सिडबी के एक कार्यक्रम में ये बातें कहीं। उन्होंने बताया कि बाहरी कारकों से चुनौतियां होने के बावजूद भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था सकारात्मक और लचीली बनी हुई है। सरकार की नीतिगत प्रतिक्रिया को झटकों को सहने के लिए तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य अंतर्निहित विकास गति को बनाए रखना है। वित्त मंत्री ने पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इस कटौती से सरकार को एक लाख करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान होगा। सीतारमण ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के विलंबित भुगतानों पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि एमएसएमई के 8.1 लाख करोड़ रुपये के भुगतान अटके हुए हैं। इससे उनकी कार्यशील पूंजी और वृद्धि प्रभावित हो रही है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि एमएसएमई को 45 दिन की समय सीमा के भीतर भुगतान करें। यह कदम एमएसएमई को वित्तीय सहायता प्रदान करेगा। समय पर भुगतान से उनकी कार्यशील पूंजी की समस्या हल होगी। इससे छोटे व्यवसायों को आगे बढ़ने में मदद मिलेगी। सीतारमण ने देश की आर्थिक मजबूती पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था बाहरी चुनौतियों के बावजूद मजबूत है। नीतिगत उपाय आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित कर रहे हैं। सरकार का लक्ष्य देश की विकास दर को बनाए रखना है। यह लोगों में आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए आवश्यक है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के अनुसार, वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार काफी मजबूत बनी हुई है। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए देश का सकल जीएसटी (GST) कलेक्शन 8.3 प्रतिशत की सालाना वृद्धि के साथ 22 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर गया है। बैंकिंग क्षेत्र का समर्थन भी लगातार मिल रहा है, जिसके तहत रिटेल कर्ज (18.1%), कृषि कर्ज (15.5%) और एमएसएमई क्षेत्र के कर्ज (18.2%) में शानदार वृद्धि दर्ज की गई है। इसके अलावा, ट्रैक्टर, यात्री वाहन और दोपहिया वाहनों की बढ़ती बिक्री के साथ-साथ सरकारी बैंकों के घटते एनपीए (NPA) जैसी बातें मजबूत घरेलू मांग और आर्थिक स्थिरता का स्पष्ट संकेत दे रही हैं।
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