
नई दिल्ली। कैप्टन शुभांशु शुक्ला एक बार फिर अंतरिक्ष की यात्रा पर जाने के लिए तैयार हैं। वे अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर जाने वाले पहले भारतीय हैं। अब वे भारत के महत्वाकांक्षी गगनयान मिशन के लिए कड़ी ट्रेनिंग ले रहे हैं। शुभांशु का कहना है कि वे अपनी इस ट्रेनिंग में भारतीय वायुसेना के टेस्ट पायलट के रूप में मिले अनुभव का पूरा इस्तेमाल कर रहे हैं।
शुभांशु शुक्ला जिन्हे उनके दोस्त ‘शुक्स’ के नाम से बुलाते हैं। उन्होंने इसरो (ISRO) के पहले मानव अंतरिक्ष मिशन को एक प्रोटोटाइप या शुरुआती मिशन बताया है। उन्होंने कहा, पूरी दुनिया में भारतीय अंतरिक्ष समुदाय और खासकर इसरो का बहुत सम्मान है। मानव मिशन की ओर कदम बढ़ाना एक बहुत बड़ा बदलाव है। गगनयान मिशन भारत को अंतरिक्ष अन्वेषण की वैश्विक दौड़ में एक खास स्थान दिलाएगा। यह अंतरिक्ष मिशनों के लिए यह एक अहम मोड़ है।
पिछले साल जून में शुभांशु उन चार अंतरिक्ष यात्रियों में शामिल थे, जिन्होंने नासा के एक्सिओम-4 मिशन के तहत अंतरिक्ष की यात्रा की थी। उन्होंने अंतरिक्ष स्टेशन पर 18 दिन बिताए थे। यह 1984 में विंग कमांडर राकेश शर्मा के बाद किसी भारतीय की 41 साल बाद अंतरिक्ष में वापसी थी। अब एक साल बाद शुभांशु बेंगलुरु में हैं। वे गगनयान मिशन के लिए चुने गए चार अंतरिक्ष यात्रियों में से एक हैं। वे अपने परिवार के साथ बेंगलुरु के ‘ह्यूमन स्पेस फ्लाइट सेंटर’ में रह रहे हैं और अपनी दूसरी अंतरिक्ष यात्रा की तैयारी कर रहे हैं।
गगनयान मिशन 2027 के मध्य में होने की संभावना है। इस मिशन का लक्ष्य तीन सदस्यों की टीम को 400 किलोमीटर की निचली कक्षा में तीन दिनों के लिए भेजना है। इसके बाद उन्हें सुरक्षित रूप से भारतीय समुद्री क्षेत्र में वापस उतारा जाएगा। शुभांशु ने कहा कि गगनयान की सफलता उन देशों को भी हिम्मत देगी जो ऐसा कुछ करना चाहते हैं। अगर भारत यह मिशन सफलतापूर्वक पूरा कर लेता है, तो वह अमेरिका, रूस और चीन के बाद मानव मिशन भेजने वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा।
लखनऊ में जन्मे शुभांशु ने बताया कि गगनयान के लिए कई नई तकनीकें विकसित की जा रही हैं। इसमें इंसानों की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है। इसरो ने हाल ही में श्रीहरिकोटा में गगनयान के लिए दूसरा ‘इंटीग्रेटेड एयर ड्रॉप टेस्ट’ सफलतापूर्वक पूरा किया है। यह उन शुरुआती मिशनों का हिस्सा है जिनसे सुरक्षा और भरोसे को साबित किया जाएगा।
शुभांशु ने अंतरिक्ष में बिताए अपने 18 दिनों के अनुभव को भी साझा किया। उन्होंने बताया कि वहां जीवन किसी स्कूल की तरह होता है, जहां आपको एक टाइमटेबल का पालन करना पड़ता है। दिन की शुरुआत सुबह 6 बजे होती थी और काम शाम छह बजे तक चलता था। उन्होंने अंतरिक्ष से पृथ्वी और चंद्रमा को देखने के अनुभव को ‘अद्भुत’ बताया। उन्होंने कहा कि 41 साल बाद अंतरिक्ष में जाने वाला भारतीय होना एक भावुक पल था। जनवरी में उन्हें शांति काल के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया गया था।
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