
नई दिल्ली । ओडिशा (Odisha) के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर (Jagannath Temple) अपनी प्राचीन परंपराओं, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित परंपराओं में से एक ‘नवकलेवर’ (Navakalevara) है, जिसके दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र (Balabhadra) और देवी सुभद्रा (Subhadra) की लकड़ी की प्रतिमाओं को निश्चित अंतराल पर नई प्रतिमाओं से प्रतिस्थापित किया जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान प्रतिमाओं में स्थापित किए जाने वाले ‘ब्रह्म पदार्थ’ को लेकर वर्षों से अनेक धार्मिक मान्यताएं और रहस्य जुड़े हुए हैं, जिन पर समय-समय पर चर्चा होती रही है।
नवकलेवर एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान है, जो सामान्यतः उस वर्ष आयोजित किया जाता है जब आषाढ़ महीने में अधिकमास पड़ता है। इस अवसर पर नई प्रतिमाओं का निर्माण निर्धारित धार्मिक विधि-विधान के अनुसार किया जाता है। परंपरा के अनुसार, पुरानी प्रतिमाओं से एक पवित्र तत्व को नई प्रतिमाओं में स्थापित किया जाता है। इसी तत्व को मंदिर परंपरा में ‘ब्रह्म पदार्थ’ या ‘ब्रह्म पदार्थ’ कहा जाता है। इसकी प्रक्रिया अत्यंत गोपनीय मानी जाती है और केवल अधिकृत सेवायत ही इसमें भाग लेते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अनुष्ठान के दौरान विशेष नियमों का पालन किया जाता है। परंपरा कहती है कि प्रक्रिया अत्यंत गोपनीय वातावरण में संपन्न होती है और इसमें शामिल सेवायत निर्धारित धार्मिक अनुशासन का पालन करते हैं। हालांकि, इस प्रक्रिया के बारे में सार्वजनिक रूप से बहुत सीमित जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। मंदिर प्रशासन भी इस धार्मिक अनुष्ठान के कई पहलुओं को परंपरा का हिस्सा मानते हुए सार्वजनिक चर्चा से अलग रखता है।
‘ब्रह्म पदार्थ’ को लेकर विभिन्न लोकमान्यताएं प्रचलित हैं। कुछ श्रद्धालु इसे भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ा दिव्य तत्व मानते हैं, जबकि अन्य इसे आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक बताते हैं। समय-समय पर ऐसी कथाएं भी सामने आती रही हैं कि इसे स्पर्श करने वाले सेवायतों को विशेष अनुभव होता है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है और न ही मंदिर प्रशासन ने इनके संबंध में कोई आधिकारिक विवरण जारी किया है।
इतिहासकारों और धर्म विशेषज्ञों का मानना है कि जगन्नाथ मंदिर की कई परंपराएं सदियों पुरानी हैं और उनका महत्व मुख्य रूप से धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा है। ‘ब्रह्म पदार्थ’ का वास्तविक स्वरूप क्या है, इसे लेकर मंदिर की परंपरा गोपनीयता बनाए रखती है। यही कारण है कि इसके संबंध में अनेक कथाएं और लोकविश्वास प्रचलित हैं, लेकिन प्रमाणित जानकारी सीमित ही उपलब्ध है।
जगन्नाथ मंदिर की पहचान केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, परंपरा और आध्यात्मिक विरासत का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं और रथ यात्रा सहित विभिन्न धार्मिक आयोजनों में भाग लेते हैं। नवकलेवर और ‘ब्रह्म पदार्थ’ से जुड़ी मान्यताएं भी इसी समृद्ध परंपरा का हिस्सा हैं। हालांकि, इनसे जुड़े चमत्कारी दावों या वैज्ञानिक निष्कर्षों की पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें धार्मिक विश्वास और परंपरागत मान्यताओं के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए, न कि स्थापित वैज्ञानिक तथ्य के रूप में।
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