
नई दिल्ली। तेलंगाना (Telangana) में जन्म के समय लिंगानुपात (Sex ratio) को लेकर चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं। साल 2024 के सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (CRS) के आंकड़ों के अनुसार, राज्य के कई जिलों में बेटियों (Daughters) की संख्या लगातार कम हो रही है। राज्य के 33 जिलों में से 14 जिलों में प्रति 1,000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या 900 से नीचे दर्ज की गई है।
इस स्थिति में नलगोंडा जिला सबसे ज्यादा चिंता का कारण बना हुआ है। यहां वर्ष 2024 में प्रति 1,000 लड़कों पर केवल 787 लड़कियों का जन्म दर्ज किया गया, जो तेलंगाना में सबसे कम और देश के सबसे खराब आंकड़ों में शामिल है। लंबे समय से इस समस्या से जूझ रहे नलगोंडा में लगातार प्रयासों के बावजूद स्थिति में बड़ा सुधार नहीं हो पाया है।
कामारेड्डी में बेटियों की संख्या बेटों से ज्यादा
जहां एक ओर कई जिलों में बेटियों की संख्या घट रही है, वहीं कामारेड्डी जिला उम्मीद की किरण बनकर सामने आया है। यह तेलंगाना का एकमात्र जिला है, जहां लड़कों की तुलना में लड़कियों का जन्म अधिक दर्ज किया गया है। कामारेड्डी में प्रति 1,000 लड़कों पर 1,060 लड़कियों का जन्म हुआ। इसके बाद मुलुगु में यह आंकड़ा 991 और सिद्दीपेट में 951 रहा। इन दोनों जिलों ने राज्य के औसत 910 से बेहतर प्रदर्शन किया है।
कई जिलों में हालात गंभीर
नलगोंडा के अलावा अन्य जिलों में भी जन्म के समय लिंगानुपात चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है। महबूबाबाद में यह आंकड़ा 805, नागरकुरनूल में 842 और वनपर्थी में 848 दर्ज किया गया। इसके अलावा वारंगल, रंगारेड्डी और खम्मम जैसे बड़े जिलों में भी लड़कियों की संख्या लड़कों की तुलना में कम रही है। साल 2024 में तेलंगाना में कुल करीब 7.7 लाख बच्चों का जन्म दर्ज किया गया। इनमें देरी से किए गए रजिस्ट्रेशन की संख्या काफी कम होने के कारण इन आंकड़ों को अधिक सटीक माना जा रहा है।
नलगोंडा में फिर लौट आई पुरानी चिंता
नलगोंडा के ताजा आंकड़ों ने वर्ष 2017 की उन घटनाओं की याद दिला दी है, जब जिले में लड़कियों की सुरक्षा के लिए गठित ‘रक्षिता’ कमेटी ने कन्या भ्रूण हत्या और शिशु हत्या के 14 मामले सामने लाए थे। उस समय कई मामलों में बेटियों के जन्म को छिपाने और उनके शवों को गुपचुप तरीके से ठिकाने लगाने की घटनाएं सामने आई थीं। वर्ष 2011 की जनगणना में भी कम उम्र के बच्चों में लड़कियों की घटती संख्या को लेकर संकेत मिल चुके थे।
बेटियों की संख्या घटने के पीछे क्या कारण?
विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कई जगह बेटों को प्राथमिकता देने की सोच बनी हुई है। सामाजिक मान्यताओं के कारण बेटे को परिवार का वंश आगे बढ़ाने वाला और बुजुर्गों का सहारा माना जाता है। वहीं, दहेज जैसी सामाजिक कुरीतियों के कारण बेटियों को आर्थिक बोझ समझने की मानसिकता भी इस समस्या को बढ़ाती है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों का कहना है कि जिन जिलों में जन्म के समय लिंगानुपात बेहद कम है, वहां सरकार को निगरानी बढ़ाने की जरूरत है। इसके लिए अल्ट्रासाउंड केंद्रों की नियमित जांच, लिंग चयन रोकने वाले PCPNDT कानून का सख्त पालन और जागरूकता अभियान जरूरी हैं।
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