
इंदौर। पिछले साल कलेक्टर नेफर्जी रजिस्ट्री कांड की जांच शुरू करवाई थी और अग्रिबाण ने धारावाहिक खबरों का प्रकाशन इस कांड से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को उजागर करने में किया था। उस वक्त भी नगर निगम की मिलीभगत उजागर हुई थी और दो दर्जन से अधिक फर्जी रजिस्ट्रियों के आधार पर कब्जे रुपए की सम्पत्तियों पर अवैध कब्जे करने और निगम से उसका नामांतरण करवाते हुए सम्पत्ति कर के खाते भी खुलवा लिए थे। अभी निगम में जो नामांतरण घोटाला पकड़ाया उसके तार फर्जी रजिस्ट्री कांड से इसलिए जुड़ेंगे, क्योंकि अभी तक जो जानकारी सामने आई उसमें निगम के मुताबिक नामांतरण कराकर 51 लोगों ने ये सम्पत्तियां अन्य को बेच डाली। पंजीयन विभाग से भी निगम ने जिन सम्पत्तियों के दस्तावेज मांगे और आगे रजिस्ट्रियां ना करने पर रोक लगाने को भी कहा है। हालांकि निगम ने अभी तक एफआईआर दर्ज नहीं कराई और ना ही असल जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की।
राजस्व विभाग में जमे बाबुओं, कम्प्यूटर ऑपरेटरों को तो इधर से उधर कर दिया। मगर इस मामले में जो दोषी अधिकारी हैं, जिनके पासवर्ड का उपयोग किया गया उन तक अभी जांच की आंच पहुंची ही नहीं है। निगम में जो नामांतरण घोटाला उजागर हुआ उसमें लगभग 354 ऐसे प्रकरण बताए गए हैं जिन्हें नोटिस भी जारी किए गए और लगभग 100 लोगों ने जवाब दिए और इनमें से अधिकांश डाक के जरिए ये जवाब आए, जिसके बाद अब निगम उनसे सीधी पूछताछ भी करेगा। कई लोगों ने कहा कि सम्पत्ति उनके नाम पर कैसे आ गई और बिक भी गई, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है। अभी महापौर और निगमायुक्त के पास भी कई लोग इस तरह की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं कि जिन सम्पत्तियों की रजिस्ट्री उन्होंने अपने नाम कराई और उसमें रह रहे हैं, वह अब पता चल रहा है कि किसी और को बेच दी गई।
दरअसल, गत वर्ष तत्कालीन कलेक्टर आशीष सिंह ने पंजीयन विभाग में हुए फर्जी रजिस्ट्री कांड की जांच शुरू करवाई थी और इस मामले में पंजीयन कार्यालय इंदौर-3 के रिकॉर्ड रूम में पदस्थ सहायक वर्ग-2 कर्मचारी मर्दनसिंह रावत को निलंबित भी किया था और एफआईआर भी दर्ज करवाई गई। इतना ही नहीं, कलेक्टर के निर्देश पर इन सभी दो दर्जन से अधिक फर्जी रजिस्ट्रियों की जांच के लिए पांच उप पंजीयकों की समिति भी गठित की गई थी। इनमें बड़ा बांगड़दा, नैनोद, बिचौली हप्सी, बिहाडिय़ा से लेकर निगम सीमा में शामिल कई कॉलोनियों के भूखंडों की भी फर्जी रजिस्ट्री करवा ली गई, जिसमें राजवाड़ा स्थित शिव विलास पैसे के पास के भूखंड की फर्जी रजिस्ट्री का मामला भी सामने आया था। मुंबई निवासी इस भूखंड के असल मालिक ने इसकी शिकायत की थी।
उस दौरान यह तथ्य भी उजागर हुआ कि इन फर्जी रजिस्ट्रियों में नगर निगम के भी कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत है, जिनकी सहायता से निगम में नामांतरण करवाते हुए सम्पत्ति कर के खाते भी खुलवा लिए और फिर कुछ सम्पत्तियां बेच भी डाली। इसमें मुंबई निवासी हस्तीमल चौकसी ने कलेक्टर को सौंपी अपनी शिकायत में कहा कि म्युन्सीपल नम्बर 68 के भूखंड का अवैध नामांतरण निगम के झोन क्रमांक 03 द्वारा किसी जितन पिता नेवाल पांडे के नाम पर कर डाला। जबकि उक्त सम्पत्ति किसी को बेची नहीं और वर्तमान में भी उनके आधिपत्य में है। यहां तक कि इस मामले में दस्तावेज में उपस्थित गवाह बाबूलाल और अशोक जोशी को नोटिस भी जारी किए। मगर ना तो जवाब मिला और ना ही वे उस पते पर पाए गए। इसमें मृत्यु प्रमाण-पत्र के साथ दर्ज वसीयत भी फर्जी पाई गई थी। थाना पंढरीनाथ ने भी पंजीयन विभाग द्वारा दर्ज करवाई इस एफआईआर की जांच-पड़ताल शुरू की और प्राप्त दस्तावेजों की फोरेंसिक जांच कराने का भी निर्णय लिया। अभी जो निगम का नामांतरण घोटाला सामने आया उसके तार इस फर्जी रजिस्ट्री कांड से भी जुड़ते नजर आ रहे हैं, क्योंकि उस वक्त भी निगम के तीन कर्मचारियों की मिलीभगत सामने आई थी।
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