
- नियंत्रण का एक मात्र उपाय है नसबंदी, उसमें भी नगर निगम फेल
उज्जैन। इंसानों के सबसे वफादार साथी कहे जाने वाले कुत्ते अब दहशत का कारण बनते जा रहे हैं। उज्जैन जिले में रोजाना 50 से अधिक लोग आवारा कुत्तों के शिकार बन रहे हैं। इनमें से बहुत कम लोगों को ही सरकारी उपचार मुहैया हो पाता है और बाकी लोग निजी अस्पतालों में महंगा उपचार कराते हैं।
उल्लेखनीय है कि नगर निगम पर शहर सीमा में कुत्तों को कंट्रोल करने की जिम्मेदारी है लेकिन निगम इस कार्य में फेल साबित हो रहा है और इनकी संख्या निरंतर बढ़ रही है। शहर का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहाँ आवारा कुत्तों की धमाचौकड़ी न होती हो और लोग उनसे परेशान न हों। यह बात अलग है कि आवारा कुत्तों को चाहने वालों की संख्या भी बहुत है लेकिन वे भी यह चाहते हैं कि इनकी संख्या नियंत्रित रहे। एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2015 में हुए सर्वे में आवारा कुत्तों की संख्या लगभग 15 हजार थी जो वर्ष 2026 में बढ़कर 25 हजार हो गई। यदि एनीमल बर्थ कंट्रोल न होता तो यह संख्या 50 हजार के पार हो गई होती। वहीं नगर निगम का दावा है कि नसबंदी अभियान में बीते दस सालों में अब तक करीब 30 हजार नसबंदियाँ की जा चुकी हैं। हालांकि निगम का यह आँकड़ा हकीकत से परे समझ आता है क्योंकि यदि ऐसा होता तो शहर आवारा कुत्तों से परेशान न होता। बता दें कि नगर निगम के पास आवारा कुत्तों के नियंत्रण का केवल एक ही उपाय है और वह है नसबंदी। इसके लिए भी प्रतिदिन आवारा कुत्तों को पकड़ा जाता है और फिर सदावल में उनकी नसबंदी की जाती है। करीब 3 दिनों तक उनकी देखरेख होती है फिर उन्हें वहीं छोड़ दिया जाता है, जहाँ से पकड़ा जाता है। यह नियम है वरना निगम पर कार्रवाई हो जाती है।