
नई दिल्ली। आमतौर पर बंदरों (Monkeys) को लेकर लोगों की भावनाएं धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से जुड़ी होती हैं, लेकिन चीन में इन दिनों मकॉक बंदरों (Macaque monkeys) की कीमतों ने सबको चौंका दिया है। नई दवाओं की खोज और मेडिकल रिसर्च (Medical Research) में इस्तेमाल होने वाले इन बंदरों की कीमत इतनी बढ़ गई है कि एक-एक मकॉक बंदर 25 लाख रुपये से ज्यादा में बिक रहा है।
रिसर्च में बढ़ती मांग और सीमित उपलब्धता के कारण वैज्ञानिकों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। कई शोधकर्ताओं को महंगी कीमतों के बावजूद बंदर नहीं मिल पा रहे हैं, जिसके चलते कुछ रिसर्च प्रोजेक्ट प्रभावित हो रहे हैं।
अचानक क्यों बढ़ गई मकॉक बंदरों की कीमत?
रिपोर्ट के अनुसार, गुआंगज़ौ की जिनान यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक गुओ शियांगयू नॉन-ह्यूमन प्राइमेट मॉडल विकसित करने पर काम कर रहे हैं। उनका शोध दिमाग से जुड़ी गंभीर बीमारियों के अध्ययन पर केंद्रित है, जिसके लिए मकॉक बंदरों की जरूरत पड़ती है। हालांकि, चीनी नव वर्ष के बाद से लैब में इस्तेमाल होने वाले मकॉक बंदरों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अब सप्लायर एक मकॉक बंदर के लिए करीब 1 लाख 80 हजार युआन यानी लगभग 25 लाख 58 हजार 772 रुपये तक मांग रहे हैं।
गुओ शियांगयू का कहना है कि समस्या केवल कीमतों की नहीं है। कई बार इतनी बड़ी रकम देने के बाद भी बंदर उपलब्ध नहीं हो पाते, क्योंकि मांग बहुत ज्यादा है और सप्लाई काफी सीमित है। वह ग्वांगडोंग प्रोविंशियल की-लैबोरेटरी ऑफ नॉन-ह्यूमन प्राइमेट रिसर्च से जुड़े हैं।
मेडिकल रिसर्च में मकॉक बंदरों की इतनी मांग क्यों?
वैज्ञानिकों के अनुसार, मकॉक बंदर इंसानों के सबसे करीब माने जाने वाले जीवों में शामिल हैं। उनके डीएनए और शरीर की जैविक प्रक्रियाएं इंसानों से काफी हद तक मिलती-जुलती हैं। इसी वजह से नई दवाओं और इलाज की तकनीकों की जांच में इनका इस्तेमाल किया जाता है।
गुओ के मुताबिक, उनकी लैब को हर साल वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए करीब 30 से 50 बंदरों की आवश्यकता होती है। इनका उपयोग पैथोलॉजिकल और मॉलिक्यूलर बायोलॉजिकल एनालिसिस जैसे शोध कार्यों में किया जाता है।
चीन में दवा और बायोटेक उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है। सरकार नई दवाओं और बायोलॉजिकल मेडिसिन के विकास को बढ़ावा दे रही है। चीन का लक्ष्य पश्चिमी देशों की दवा इंडस्ट्री पर निर्भरता कम कर दुनिया के प्रमुख मेडिसिन हब में शामिल होना है।
दवा बनाने की प्रक्रिया में क्यों जरूरी हैं जानवरों पर परीक्षण?
किसी भी नई दवा को सीधे बाजार में लॉन्च नहीं किया जाता। पहले उसे प्रयोगशालाओं में जांचा जाता है, फिर जानवरों पर परीक्षण कर उसके प्रभाव और सुरक्षा का अध्ययन किया जाता है। इसके बाद ही संबंधित मंजूरी और प्रमाणन मिलने पर दवा को बाजार में उतारा जाता है।
चीन ने पिछले कुछ वर्षों में बायोटेक सेक्टर में बड़े स्तर पर निवेश किया है। कैंसर, मोटापा, डायबिटीज, हार्ट अटैक और ऑटोइम्यून बीमारियों जैसी गंभीर समस्याओं के इलाज के लिए नई दवाओं पर काम किया जा रहा है।
बंदरों की कमी बनी नई चुनौती
हालांकि, मकॉक बंदरों की बढ़ती मांग अब वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती बन रही है। ज्यादा इस्तेमाल और सीमित उपलब्धता के कारण इनकी संख्या पर असर पड़ रहा है। अनुमान के मुताबिक, चीन में वर्ष 2025 से 2027 के बीच हर साल करीब 49 हजार से 52 हजार बंदर ही लैब रिसर्च के लिए उपलब्ध हो पाएंगे। ऐसे में दवा अनुसंधान की रफ्तार बनाए रखना वैज्ञानिकों के लिए मुश्किल चुनौती बन सकता है।
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