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रोशनी पड़ते ही सोने सा चमकने लगता है यह अनोखा पौधा जानिए श्रीलंका की अशोक वाटिका का रहस्य और वैज्ञानिक वजह

July 22, 2026

नई दिल्ली । रामायण (Ramayana)से जुड़े स्थलों और उनसे जुड़ी कथाओं(memories) को लेकर लोगों में हमेशा गहरी आस्था और जिज्ञासा(sites and legends) रही है। श्रीलंका का नाम आते ही रावण(Ravana) माता सीता (Sita)और अशोक वाटिका की स्मृतियां ताजा हो जाती हैं। माना जाता है कि यही वह स्थान था जहां रावण ने माता सीता को रखा था। आज भी श्रीलंका के मध्य पर्वतीय क्षेत्र में स्थित नुवारा एलिया के आसपास कई ऐसे स्थान हैं जिन्हें स्थानीय परंपराओं में रामायण से जोड़ा जाता है। इन्हीं स्थानों में एक ऐसा दुर्लभ पौधा भी चर्चा का विषय बना हुआ है जिसकी पत्तियां प्रकाश पड़ते ही सुनहरे रंग की तरह चमकने लगती हैं।

यह पौधा सामान्य परिस्थितियों में किसी साधारण वनस्पति जैसा ही दिखाई देता है लेकिन जैसे ही इस पर सूर्य की किरणें या तेज रोशनी पड़ती है इसकी पत्तियां सुनहरी आभा बिखेरने लगती हैं। घने जंगल या हल्के अंधेरे में इसकी चमक और अधिक स्पष्ट दिखाई देती है जिससे इसे देखने वाले लोग पहली नजर में चकित रह जाते हैं। यही विशेषता इसे दुनिया के अलग अलग हिस्सों से आने वाले पर्यटकों और प्रकृति प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बनाती है।

स्थानीय लोगों का विश्वास है कि यह पौधा रामायण काल की वनस्पतियों का अवशेष है और इसका संबंध अशोक वाटिका से जुड़ी प्राचीन मान्यताओं से है। कई श्रद्धालु इसे दिव्य वनस्पति मानते हैं और इसकी चमक को आध्यात्मिक महत्व से जोड़ते हैं। हालांकि इन धार्मिक मान्यताओं की स्वतंत्र ऐतिहासिक या वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

दूसरी ओर वनस्पति वैज्ञानिक इस पौधे की चमक को प्राकृतिक संरचना का परिणाम मानते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इसकी पत्तियों की सतह पर मौजूद सूक्ष्म कोशिकीय संरचना और प्राकृतिक रंजक प्रकाश को विशेष तरीके से परावर्तित करते हैं। इसी कारण सूर्य का प्रकाश पड़ने पर पत्तियां सुनहरी दिखाई देती हैं। इसे प्रकाश परावर्तन की एक प्राकृतिक प्रक्रिया माना जाता है जो कुछ अन्य दुर्लभ पौधों में भी अलग अलग रूप में देखने को मिलती है।

श्रीलंका का यह क्षेत्र अपनी जैव विविधता के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां अनेक दुर्लभ औषधीय पौधे और वनस्पतियां पाई जाती हैं जिन पर लगातार शोध किए जा रहे हैं। कई वनस्पतियां ऐसी हैं जो भारत में बहुत कम या बिल्कुल नहीं मिलतीं। यही कारण है कि दुनिया भर के शोधकर्ता यहां की वनस्पति संपदा का अध्ययन करने पहुंचते हैं।


  • रामायण से जुड़े स्थलों की ऐतिहासिकता और उनसे संबंधित वनस्पतियों को लेकर अलग अलग मत हैं। आस्था रखने वाले लोग इन्हें पौराणिक इतिहास का हिस्सा मानते हैं जबकि वैज्ञानिक इनके प्राकृतिक गुणों का अध्ययन कर रहे हैं। फिलहाल इस बात का कोई प्रमाणित वैज्ञानिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है कि यह विशेष पौधा वास्तव में रामायण काल का ही है। फिर भी इसकी अनोखी चमक और स्थानीय परंपराओं से जुड़ाव इसे बेहद रोचक और आकर्षक बनाता है।

    आस्था और विज्ञान के इस अनूठे संगम ने श्रीलंका के इस रहस्यमयी पौधे को दुनिया भर में विशेष पहचान दिलाई है। यही वजह है कि यह स्थान धार्मिक पर्यटन के साथ साथ प्रकृति और विज्ञान में रुचि रखने वाले लोगों के लिए भी एक खास आकर्षण बना हुआ है।

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