
नई दिल्ली। आज उत्तर कोरिया (North Korea) का नाम आते ही दुनिया के सबसे रहस्यमय और बंद देशों में से एक की छवि सामने आती है। परमाणु हथियार (परमाणु हथियार), कड़े सरकारी नियंत्रण, सीमित इंटरनेट और तानाशाही शासन (Dictatorial Government) इसकी पहचान बन चुके हैं। लेकिन करीब आठ-नौ दशक पहले तस्वीर बिल्कुल अलग थी। वर्तमान उत्तर कोरिया का इलाका कभी पूरे कोरियाई प्रायद्वीप का सबसे विकसित, औद्योगिक और आधुनिक क्षेत्र माना जाता था।
प्योंगयांग था आधुनिकता और शिक्षा का प्रमुख केंद्र
1948 में उत्तर कोरिया के गठन से पहले यह क्षेत्र एकीकृत कोरिया का हिस्सा था। ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि 20वीं सदी की शुरुआत में प्योंगयांग आधुनिक शिक्षा, ईसाई मिशनरियों और पश्चिमी संस्कृति का प्रमुख केंद्र था। बड़ी संख्या में चर्च, मिशनरी स्कूल और सांस्कृतिक संस्थान यहां मौजूद थे। इसी कारण प्योंगयांग को उस दौर में ‘पूर्व का यरुशलम’ कहा जाता था।
औद्योगिक विकास में दक्षिण कोरिया से था आगे
1910 से 1945 के बीच जापानी शासन के दौरान उत्तर का इलाका खनिज संपदा और प्राकृतिक संसाधनों के कारण औद्योगिक केंद्र के रूप में विकसित किया गया। यहां विशाल इस्पात संयंत्र, रासायनिक उद्योग, जलविद्युत परियोजनाएं और रेलवे नेटवर्क स्थापित किए गए। उस समय दक्षिण कोरिया मुख्य रूप से कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भर था, जबकि उत्तर का हिस्सा औद्योगिक रूप से कहीं अधिक मजबूत माना जाता था।
विभाजन और युद्ध ने बदल दी तस्वीर
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1945 में कोरियाई प्रायद्वीप 38वीं समानांतर रेखा के आधार पर दो हिस्सों में विभाजित हो गया। उत्तरी भाग सोवियत संघ के प्रभाव में आया और 1948 में किम इल सुंग के नेतृत्व में उत्तर कोरिया की स्थापना हुई। इसके बाद 1950 से 1953 तक चले कोरियाई युद्ध में बड़े पैमाने पर तबाही हुई और कई शहर, उद्योग तथा आधारभूत ढांचे नष्ट हो गए।
कुछ समय तक तेज विकास, फिर अलगाव की नीति
युद्ध के बाद सोवियत संघ और चीन की आर्थिक मदद से उत्तर कोरिया ने तेजी से पुनर्निर्माण किया। 1970 के दशक तक उसकी प्रति व्यक्ति आय दक्षिण कोरिया के बराबर या कई मामलों में बेहतर मानी जाती थी। लेकिन बाद में किम इल सुंग की ‘जुचे’ (आत्मनिर्भरता) नीति के तहत देश ने खुद को बाहरी दुनिया से लगभग पूरी तरह अलग कर लिया।
सोवियत संघ के पतन के बाद गहराया संकट
1990 के दशक में सोवियत संघ के विघटन के साथ उत्तर कोरिया को मिलने वाली आर्थिक सहायता और सस्ते ईंधन की आपूर्ति बंद हो गई। इसके बाद देश गंभीर खाद्य संकट और अकाल की चपेट में आ गया। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, इस दौरान भूख और कुपोषण से बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई।
‘सोंगबुन’ व्यवस्था से तय होती है नागरिकों की पहचान
उत्तर कोरिया में नागरिकों की सामाजिक स्थिति ‘सोंगबुन’ नामक व्यवस्था से तय होती है। परिवार की राजनीतिक निष्ठा के आधार पर लोगों को अलग-अलग वर्गों में बांटा जाता है। यही व्यवस्था तय करती है कि किसी व्यक्ति को बेहतर शिक्षा, नौकरी या राजधानी प्योंगयांग में रहने का अवसर मिलेगा या नहीं।
कड़े नियंत्रण में गुजरता है आम नागरिक का जीवन
देश में शिक्षा व्यवस्था पर भी सरकार का पूर्ण नियंत्रण है। बच्चों को शुरुआती उम्र से ही किम परिवार के प्रति निष्ठा और सरकारी विचारधारा पढ़ाई जाती है। नागरिकों की आवाजाही भी नियंत्रित रहती है और बिना अनुमति एक जिले से दूसरे जिले में जाना भी अपराध माना जा सकता है। इंटरनेट की पहुंच बेहद सीमित है और आम लोग केवल सरकारी नेटवर्क तक ही सीमित रहते हैं।
तरक्की से तानाशाही तक का सफर
जिस क्षेत्र को कभी आधुनिकता, उद्योग और आर्थिक विकास का प्रतीक माना जाता था, वही आज दुनिया के सबसे बंद और नियंत्रित देशों में शामिल है। उत्तर कोरिया का इतिहास समृद्ध विकास की कहानी कहता है, लेकिन वर्तमान में वह अंतरराष्ट्रीय अलगाव, कड़े सरकारी नियंत्रण और सीमित स्वतंत्रता के कारण वैश्विक चर्चा का विषय बना हुआ है।
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