
नई दिल्ली: करूर भगदड़ मामले (Karur stampede case) में तमिलनाडु की विजय सरकार (Tamil Nadu’s Vijay Government) को बड़ा झटका लगा है. मद्रास हाई कोर्ट ने मृतकों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने का सरकारी आदेश रद्द कर दिया है. अदालत ने कहा कि इस मामले की जांच अभी CBI कर रही है. साथ ही सुप्रीम कोर्ट भी इसकी निगरानी कर रहा है. ऐसे में जांच पूरी होने से पहले इस मुद्दे पर कोई राय देना उचित नहीं होगा. मद्रास हाई कोर्ट ने उन जनहित याचिकाओं पर सुनवाई की, जिनमें करूर भगदड़ में जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों को सरकारी नौकरी देने के फैसले को चुनौती दी गई थी. सुनवाई के बाद अदालत ने तमिलनाडु सरकार का आदेश रद्द कर दिया.
CBI जांच का दिया हवाला
कोर्ट ने कहा कि करूर भगदड़ की जांच फिलहाल CBI के पास है. इतना ही नहीं, इस पूरी जांच पर सुप्रीम कोर्ट भी नजर बनाए हुए है. इसलिए घटना के तथ्यों या जिम्मेदारी को लेकर इस स्तर पर कोई टिप्पणी करना उचित नहीं होगा. अदालत ने साफ किया कि मामले की जांच जारी है. ऐसे में अंतिम नतीजे आने से पहले किसी भी तरह का प्रशासनिक फैसला उचित नहीं माना जा सकता. इसी वजह से सरकारी नौकरी देने का आदेश रद्द किया गया.
क्या है मामला?
बता दें कि 27 सितंबर 2025 को करूर जिले के वेलुस्वामीपुरम में TVK की एक राजनीतिक रैली के दौरान भगदड़ मच गई थी. विजय का भाषण सुनने के लिए बड़ी संख्या में समर्थक पहुंचे थे. भीड़ बेकाबू होने से 41 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि कई अन्य घायल हुए थे. इस मामले की जांच फिलहाल CBI कर रही है. एजेंसी TVK के कई वरिष्ठ पदाधिकारियों से पूछताछ कर उनके बयान भी दर्ज कर चुकी है. इसी आदेश को चुनौती देते हुए कई जनहित याचिकाएं दायर की गई थीं.
मुख्यमंत्री बनने के बाद 10 जुलाई 2026 को विजय पहली बार करूर पहुंचे थे. इस दौरान उन्होंने सितंबर 2025 की करूर भगदड़ से प्रभावित परिवारों के लिए पुनर्वास कार्यक्रम की शुरुआत की. साथ ही, जान गंवाने वाले 41 लोगों के परिवारों में से 32 पात्र सदस्यों को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी के नियुक्ति पत्र सौंपे. राज्य सरकार ने भगदड़ में जान गंवाने वाले प्रत्येक परिवार के एक पात्र सदस्य को सरकारी नौकरी देने का फैसला किया था. जिसे अब मद्रास हाई कोर्ट ने सरकार का यह आदेश रद्द कर दिया है.
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