नई दिल्ली। देश की न्याय व्यवस्था (Judicial system) पर लंबित मामलों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। केंद्र सरकार ने संसद में बताया कि सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट (Supreme Court, High Court) और जिला अदालतों को मिलाकर देशभर में 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। इनमें हजारों ऐसे मुकदमे भी शामिल हैं, जो दो से तीन दशक से अधिक समय से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
राज्यसभा में सांसद दिलीप कुमार राय के प्रश्न के लिखित उत्तर में कानून एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) के आंकड़ों का हवाला देते हुए यह जानकारी दी।
28 जुलाई 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश की सर्वोच्च अदालत में 95,936 मामले लंबित हैं। इनमें कई ऐसे मुकदमे हैं, जिनका निस्तारण दशकों से नहीं हो पाया है।
सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों का विवरण इस प्रकार है:
देश के 25 हाईकोर्टों में कुल 63.76 लाख मामले लंबित हैं। इनमें:
लंबित मामलों की संख्या के लिहाज से इलाहाबाद हाईकोर्ट देश में पहले स्थान पर है। यहां कुल 12.28 लाख मुकदमे लंबित हैं।
इनमें:
इसके बाद कलकत्ता हाईकोर्ट का स्थान आता है, जहां 30 वर्ष से अधिक पुराने 11,417 मामले लंबित हैं।
अन्य प्रमुख हाईकोर्टों की स्थिति:
देश की जिला और अधीनस्थ अदालतों में लंबित मामलों की संख्या सबसे अधिक है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार यहां 4.98 करोड़ से ज्यादा मुकदमे लंबित हैं।
इनमें 81,275 मामले ऐसे हैं, जो 30 वर्ष से अधिक समय से न्याय का इंतजार कर रहे हैं।
संसद में पेश किए गए आंकड़े बताते हैं कि न्यायपालिका पर लंबित मामलों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट से लेकर जिला अदालतों तक करोड़ों मुकदमे लंबित होने के कारण न्याय मिलने में वर्षों का समय लग रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायाधीशों के रिक्त पदों को भरने, न्यायिक ढांचे को मजबूत करने, डिजिटल प्रणाली के विस्तार और वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र को बढ़ावा देने जैसे कदम लंबित मामलों के बोझ को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
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