
वाशिंगटन। अमेरिका (America) ने ईरान (Iran) को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने के लिए वैश्विक अभियान का ऐलान किया है। इसे ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ (‘Operation Economic Outcast’) नाम दिया गया है। इसके जरिए ईरान के वित्तीय ढांचे, तेल से होने वाली कमाई और वैश्विक संबंधों को निशाना बनाने की व्यापक रणनीति है। माना जा रहा है कि इसका असर भारत-ईरान व्यापार संबंधों (India-Iran trade relations) पर भी देखने को मिल सकता है।
भारत ईरान के पांच सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में रहा है। हालांकि, दोनों देशों के बीच व्यापार 2018-19 के 17 अरब डॉलर के उच्चतम स्तर से 90 फीसदी से अधिक गिर चुका है। अब भारत से ईरान को ज्यादातर उन्हीं सामानों का निर्यात होता है, जिन्हें मानवीय आधार पर अमेरिकी प्रतिबंधों से छूट मिली हुई है।
इन चीजों पर खास अशर
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका की ईरान पर प्रस्तावित इन नई पाबंदियों से ईरान को भारत के चावल, चाय, कॉफी, मसाले और दवाओं के निर्यात पर बुरा असर पड़ सकता है। हाल के कुछ वर्षों में इन सामानों का बड़ा हिस्सा दुबई के बंदरगाह के रास्ते ईरान पहुंचता रहा है। अभी प्रमुख रूप से खतरा भारतीय निर्यातकों, बैंकों, शिपिंग और ढुलाई वाली कंपनियों और चाबहार प्रॉजेक्ट पर मंडरा रहा है। भारतीय निर्यातकों को चिंता है कि इन नए प्रतिबंधों से भारत और ईरान के कमजोर हो चुके व्यापार पर और बुरा असर होगा।
ईरान के साथ व्यापार की मौजूदा स्थिति
भारत और ईरान के बीच औपचारिक व्यापार अब उस स्तर पर नहीं है, जो अमेरिकी प्रतिबंधों से पहले था। वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 में द्विपक्षीय व्यापार लगभग 14,483.81 करोड़ रुपये का रहा। इसमें भारत का निर्यात 11,113.35 करोड़ रुपये, जबकि आयात करीब 3,325.45 करोड़ रुपये का रहा।
2018 के बाद बदले हालात
2018-19 में भारत-ईरान के बीच कुल 36,371.30 करोड़ रुपये व्यापार हुआ था, जिसमें भारत ने ईरान को 5,685.62 करोड़ रुपये का माल भेजा था, जबकि ईरान से 30,685,68 करोड़ रुपये के सामान खरीदा था। अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद न केवल दोनों देशों के बीच का व्यापार घटा, बल्कि व्यापार की प्रकृत्ति भी उलट गई। हालांकि अब भारत ईरान को ज्यादा निर्यात करता है और आयात कम हो गया है।
कच्चे तेल में उछाल संभव
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी के इस अभियान के कारण अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है। यदि ईरान का कच्चा तेल बाजार से पूरी तरह बाहर होता है, तो वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेजी आने की संभावना है।
ईरानी तेल का आयात घटा
भारत का ईरान से कच्चे तेल का आयात 2026 में काफी घटा है। आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका-ईरान संघर्ष और होर्मुज संकट के बीच भारत ने मार्च में मध्य-पूर्व से तेल आयात 61% घटाकर 1.18 मिलियन बैरल प्रतिदिन कर दिया था। भारत ने मई में सात साल बाद ईरानी तेल आयात फिर शुरू किया था। जनवरी-जून में भारत ने ईरान से 70.7 करोड़ डॉलर का तेल खरीदा।
इन देशों पर शिकंजा
चीन- ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार चीन रहा है। ईरान के समुद्री रास्ते से होने वाले तेल निर्यात का 80 फीसदी से ज्यादा चीन जाता है। अमेरिका ने इन नए प्रतिबंधों के जरिए ईरान और चीन के कारोबार को रोकने या कम करने की कोशिश की है।
तुर्किये- तुर्किये भी ईरान का कारोबारी साझेदार है। ईरान लंबे समय से तब्रीज़-अंकारा पाइपलाइन के माध्यम से तुर्किये को पाइपलाइन गैस की आपूर्ति करता रहा है। साथ ही पेट्रोकेमिकल्स, खाद्य उत्पाद और निर्माण सामग्री भी।
इराक- ईरान इराक में बिजली उत्पादन के लिए गैस का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। यह खाद्य उत्पादों, भवन निर्माण सामग्री और विनिर्मित वस्तुओं का भी एक प्रमुख स्रोत है।
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