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रिहायशी इलाकों में मौत का चक्रव्यूह बने निजी अस्पताल

September 03, 2026

  • ननि और स्वास्थ्य विभाग के अफसरों की मेहरबानी बनी कवच, टैक्स वसूली में मस्त निगम सुरक्षा मानकों पर साधे चुप्पी

जबलपुर। संस्कारधानी के शांत मोहल्लों, कॉलोनियों और घरेलू बसाहटों के बीच गैरकानूनी तरीके से निजी अस्पतालों का जाल बिछ चुका है। जहां सिर्फ मकान होने चाहिए थे, वहां अब 24 घंटे सायरन बजते हैं और मरीजों की भीड़ उमड़ती है। नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अफसर आंखें मूंदकर बैठे हैं। नगर निगम इन अवैध ढांचों से हर साल संपत्ति कर और दूसरा टैक्स बिना हिचक वसूल रहा है, वहीं मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी का दफ्तर नियमित लाइसेंस फीस जमा करवाकर नवीनीकरण कर देता है। शिकायतें मिलने पर विभाग केवल कागजी नोटिस भेजकर अपनी औपचारिकता पूरी कर लेता है। कड़े कानूनी एक्शन से बचने के पीछे एक बड़ा कारण राजनीतिक संरक्षण है, क्योंकि विभिन्न सियासी दलों के रसूखदार नेता, पदाधिकारी और उनके सगे-संबंधी इन अस्पतालों के संचालक या पार्टनर हैं। ऐसे में किसी बड़े हादसे के पहले कोई भी अफसर इन पर ठोस कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।



  • बड़ी आबादी की सुरक्षा पर गंभीर संकट
    टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के प्रावधानों और मास्टर प्लान को दरकिनार करके डॉक्टरों और बिल्डरों ने रिहायशी भूखंडों पर बहुमंजिला चिकित्सा केंद्र खड़े कर दिए हैं। इन संकरी गलियों में 2 या 3 मंजिला मकानों के बीच चल रहे इन क्लिनिकों और नर्सिंग होम के पास न तो अपनी पार्किंग की जगह है और न ही एंबुलेंस के आने-जाने का खुला रास्ता बचा है। मुख्य सड़कों पर खड़ी होने वाली मरीजों के परिजनों की गाडिय़ां पूरे क्षेत्र का आवागमन जाम कर देती हैं। सबसे बड़ा खतरा आपातकालीन स्थिति से निपटने के साधनों को लेकर है। अधिकांश इमारतों में आग बुझाने के पर्याप्त यंत्र नहीं हैं और न ही आपात निकास द्वार तय मानकों पर बने हैं। घनी आबादी के बीच जहरीला मेडिकल कचरा सही तरीके से नष्ट न होना मोहल्लेवासियों के दैनिक जीवन में गंभीर बीमारियां फैला रहा है।

    कार्रवाई, जो नहीं की जा रही
    प्रशासनिक स्तर पर इस पूरे मनमाने कारोबार को खुला संरक्षण मिलता साफ दिखाई देता है। कायदे से जिस निर्माण को अवैध घोषित कर सील किया जाना चाहिए, उसे नगर पालिका निगम का अमला टैक्स का वैध खाता नंबर थमा देता है। दूसरी तरफ चिकित्सा महकमा भी नर्सिंग होम एक्ट की शर्तों की जांच किए बिना दफ्तर में बैठकर फाइलें पास कर रहा है। जब भी स्थानीय नागरिक आवाज उठाते हैं या कोई बड़ा विवाद खड़ा होता है, तो संबंधित अस्पताल को 7 से 15 दिनों का कारण बताओ नोटिस थमाकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। आज तक किसी भी ऐसे संस्थान का रजिस्ट्रेशन पूरी तरह रद्द करके तालाबंदी नहीं की गई। दोनों प्रमुख विभाग एक-दूसरे के पाले में गेंद फेंककर अपनी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते रहते हैं।

    नेताओं की कृपा भी बरस रही
    कार्रवाई न होने की सबसे मजबूत वजह इस पूरे मेडिकल धंधे में शामिल मजबूत राजनीतिक गठजोड़ है। सत्ता और विपक्ष के कई वरिष्ठ नेताओं, विधायकों के करीबियों और पार्टी से जुड़े रसूखदार पदाधिकारियों की इन संस्थाओं में सीधी भागीदारी या रिश्तेदारी है। कई डॉक्टर खुद राजनीतिक मंचों पर सक्रिय हैं और चुनावों के समय पार्टियों के कार्यक्रमों में आगे रहते हैं। इस सियासी रसूख के कारण जब भी फील्ड इंस्पेक्टर या जांच दल मौके पर जाने की कोशिश करता है, ऊपर से फोन घनघनाने लगते हैं। इसी का फायदा उठाकर संचालक बिना नेशनल बिल्डिंग कोड के पालन के मरीजों को भर्ती कर रहे हैं। यदि समय रहते इन पर लगाम नहीं लगाई गई, तो आने वाले दिनों में किसी भी अप्रिय घटना का खामियाजा सिर्फ आम जनता को भुगतना पड़ेगा।

    यह बहुत गंभीर विषय है। नगर निगम की ओर से जल्दी इस बारे में जांच कराई जाएगी कि कौन से अस्पताल हैं जो कॉलोनियों बने हुए हैं। निश्चित ही सख्त कार्रवाई की जाएगी।
    रामप्रकाश अहिरवार, निगमायुक्त

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