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हिमालयी राज्यों में प्राकृतिक आपदा से बचाव की तैयारी तेज, ग्लेशियल झीलों की निगरानी और समय पर चेतावनी पर सरकार का जोर

September 04, 2026

नई दिल्ली । नेपाल में हाल में आई भयावह बाढ़ (Flood) के बाद भारत सरकार (Government) ने हिमालयी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में संभावित प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की तैयारियों की व्यापक समीक्षा की है। सरकार का मुख्य ध्यान ग्लेशियल झीलों के फटने से आने वाली बाढ़, हिमस्खलन (Avalanche) और इससे जुड़े अचानक बढ़ने वाले जलप्रवाह के खतरे पर है। इसी सिलसिले में गुरुवार को केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन (Govind Mohan) की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय बैठक हुई।

बैठक में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिवों तथा राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। केंद्र की ओर से गृह मंत्रालय, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, केंद्रीय जल आयोग, भारत मौसम विज्ञान विभाग और रक्षा भू-सूचना विज्ञान अनुसंधान प्रतिष्ठान के वरिष्ठ अधिकारी भी बैठक में मौजूद रहे।

बैठक का उद्देश्य हिमालयी क्षेत्रों में ऐसे स्थानों की पहचान करना था, जहां ग्लेशियल झीलों, बर्फ से ढके इलाकों और हिमस्खलन के कारण अचानक आपदा की स्थिति बन सकती है। सरकार ने संवेदनशील ग्लेशियल झीलों और जोखिम वाले क्षेत्रों की लगातार निगरानी को तैयारियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है।

ग्लेशियल झीलें हिमनदों के पिघलने या पीछे हटने से बनने वाली जलराशियां होती हैं। यदि किसी झील की प्राकृतिक सीमा कमजोर होती है और पानी अचानक बाहर निकलता है, तो नीचे के इलाकों में तेज जलप्रवाह और बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है। ऐसे मामलों में नुकसान कम करने के लिए समय पर खतरे की पहचान और चेतावनी जारी करना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

बैठक में अत्यधिक जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करने और संभावित जलप्रवाह मार्गों का निर्धारण करने पर भी जोर दिया गया। इसका उद्देश्य किसी संभावित घटना की स्थिति में यह पहले से समझना है कि पानी किस दिशा में बढ़ सकता है और किन आबादी वाले क्षेत्रों या महत्वपूर्ण स्थानों पर उसका असर पड़ सकता है।

केंद्रीय गृह सचिव ने इस बात पर जोर दिया कि संवेदनशील ग्लेशियल झीलों और हिमस्खलन संभावित क्षेत्रों की निगरानी केवल समय-समय पर होने वाली गतिविधि नहीं होनी चाहिए। जोखिम बढ़ने की स्थिति में सक्रिय निगरानी और समय रहते चेतावनी जारी करने की व्यवस्था जरूरी है, ताकि प्रशासन और स्थानीय स्तर पर बचाव की कार्रवाई शुरू की जा सके।

बैठक में राज्यों ने अपनी मौजूदा तैयारियों और आपदा प्रबंधन रणनीतियों की जानकारी दी। इसके बाद राज्य एजेंसियों, जिला प्रशासन और वैज्ञानिक एवं तकनीकी संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया गया। सरकार का मानना है कि वैज्ञानिक निगरानी से प्राप्त जानकारी यदि स्थानीय प्रशासन तक तेजी से पहुंचती है, तो संभावित नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है।

तैयारी की रणनीति में केवल आपदा के बाद राहत और बचाव पर निर्भर रहने के बजाय जोखिम कम करने वाले उपायों को प्राथमिकता देने की बात कही गई। राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को अपनी व्यवस्थाओं की नियमित समीक्षा करने, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली की कमियों को दूर करने और जरूरत पड़ने पर निकासी व्यवस्था को बेहतर बनाने की सलाह दी गई।


  • सरकार की योजना का प्रमुख उद्देश्य किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा के आने से पहले संभावित जोखिमों की पहचान करना और प्रशासन को कार्रवाई के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध कराना है। इसके लिए निगरानी, चेतावनी, स्थानीय समन्वय और समुदाय की तैयारी को एक साथ मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।

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