काबुल/रियाद। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किए (Pakistan, Saudi Arabia and Turkey) के बीच हुए त्रिपक्षीय रक्षा समझौते (Defence agreements) के कुछ ही समय बाद सऊदी अरब (Saudi Arabia) के एक फैसले ने क्षेत्रीय राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। रियाद ने अफगानिस्तान में ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ा एक बड़ा समझौता किया है। इसे पाकिस्तान की उस रणनीति के लिए झटका माना जा रहा है, जिसके तहत वह तालिबान सरकार को क्षेत्रीय स्तर पर अलग-थलग रखने की कोशिश करता रहा है।
पिछले महीने 7 अगस्त को मक्का में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए ने एक त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसे ‘मक्का पैक्ट’ और ‘इस्लामिक नाटो’ जैसे नाम दिए गए। समझौते के तहत किसी एक सदस्य देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाना था। यह प्रावधान नाटो के अनुच्छेद-5 से मिलता-जुलता है।
हालांकि, अब सऊदी अरब का अफगानिस्तान के साथ सीधे आर्थिक सहयोग करना इस समझौते के राजनीतिक प्रभाव को लेकर सवाल खड़े कर रहा है।
7 सितंबर को तालिबान के नेतृत्व वाले अफगान प्रशासन ने सऊदी ऊर्जा कंपनी डेल्टा इंटरनेशनल के साथ एक अहम समझौता किया। इसके तहत पश्चिमी कुशक-तिरपुल बेसिन में तेल और गैस की खोज की जाएगी। इस क्षेत्र में हेरात और बदगिस प्रांत के कुछ हिस्से शामिल हैं।
यह समझौता 25 साल के लिए किया गया है और इसकी शुरुआती कीमत करीब 200 मिलियन डॉलर बताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, इसे भविष्य में बड़े ऊर्जा निवेश की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है। संभावित निवेश कई अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान भी लगाया गया है।
अफगानिस्तान को लेकर पाकिस्तान लंबे समय से अपने प्रभाव को महत्वपूर्ण मानता रहा है। तालिबान सरकार के साथ पाकिस्तान के संबंधों में भी हाल के समय में तनाव देखने को मिला है। ऐसे में सऊदी अरब का सीधे अफगानिस्तान में निवेश करना इस्लामाबाद के लिए रणनीतिक चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है।
रियाद के इस कदम से यह संकेत मिलता है कि वह क्षेत्रीय मामलों में अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों के आधार पर स्वतंत्र फैसले लेने को तैयार है। इसका असर अफगानिस्तान में पाकिस्तान के पारंपरिक प्रभाव पर भी पड़ सकता है।
इस डील को भू-राजनीतिक रूप से इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि समझौते के दौरान अमेरिका के पूर्व अफगानिस्तान दूत और 2020 के दोहा समझौते में अहम भूमिका निभाने वाले जल्मे खलीलजाद भी मौजूद थे।
समझौते के बाद खलीलजाद ने इसे अफगानिस्तान के अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश के लिए खुलने का संकेत बताया। उनकी मौजूदगी ने इस समझौते को सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि व्यापक क्षेत्रीय संदर्भ भी दे दिया।
सऊदी अरब पहले पाकिस्तान में बड़े निवेश की योजनाओं का ऐलान कर चुका है। करीब 20 अरब डॉलर के निवेश की चर्चा हुई थी, लेकिन उसके अमल में आने को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं रही। इसके विपरीत अब रियाद ने अफगानिस्तान में एक ठोस ऊर्जा समझौता किया है।
यही अंतर पाकिस्तान के लिए चिंता का विषय बन सकता है। इस कदम से यह संदेश जाता है कि सऊदी अरब पाकिस्तान के क्षेत्रीय हितों के अनुरूप अपनी विदेश और निवेश नीति तय करने के बजाय अपने आर्थिक हितों को प्राथमिकता दे रहा है।
मक्का रक्षा समझौते के बाद इसे मुस्लिम देशों के बीच एक नए सुरक्षा ढांचे की शुरुआत के तौर पर पेश किया गया था। लेकिन ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों और यमन को लेकर क्षेत्रीय तनाव के बीच पाकिस्तान की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।
ऐसे में सऊदी अरब का अफगानिस्तान में सीधे निवेश करना इस बात की परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है कि मक्का समझौता वास्तव में सदस्य देशों के बीच कितनी व्यापक रणनीतिक एकजुटता कायम कर पाता है।
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच किसी बड़े मतभेद की शुरुआत हो गई है। लेकिन अफगानिस्तान में रियाद की नई ऊर्जा डील ने दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया के बदलते समीकरणों पर बहस जरूर तेज कर दी है।
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