
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल (West Bengal) में उपचुनाव (By-election) से पहले ममता बनर्जी गुट (Mamata Banerjee faction) के सामने एक के बाद एक नए राजनीतिक और कानूनी मोर्चे खुल गए हैं। शुक्रवार को चुनाव आयोग (Election Commission) ने ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ (All India Trinamool Congress) नाम और उसके पारंपरिक ‘फूल-घास’ चुनाव चिह्न को दोनों गुटों के लिए फ्रीज कर दिया। इसके कुछ ही घंटों बाद नंदीग्राम उपचुनाव में ममता गुट की प्रत्याशी संचिता प्रधान डे ने नामांकन वापस ले लिया। ममता ने इसके बाद कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देने का ऐलान किया, लेकिन कुछ ही घंटे बाद मिलन प्रधान की पुराने हत्या मामले में गिरफ्तारी हो गई।
इन घटनाक्रमों के बीच ममता बनर्जी गुट ने चुनाव आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न से जुड़े मामले में तत्काल सुनवाई की मांग की गई है। याचिका पर 21 सितंबर को सुनवाई के लिए उल्लेख किए जाने की संभावना है।
चुनाव आयोग ने दोनों गुटों की पहचान अलग की
चुनाव आयोग ने 17 सितंबर को अंतरिम आदेश जारी कर दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को मूल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल-घास’ वाले पारंपरिक चिह्न के इस्तेमाल से रोक दिया। आयोग ने इसके पीछे दोनों पक्षों के पार्टी पर अधिकार के दावे और आगामी उपचुनावों में मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति को आधार बनाया।
इसके बाद शुक्रवार को ममता बनर्जी के गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिह्न दिया गया। दूसरे गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चिह्न मिला। ये व्यवस्थाएं आगामी उपचुनावों के लिए अंतरिम तौर पर लागू हैं।
ममता गुट ने आयोग के फैसले पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि आयोग ने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और बहुसंख्यक कैडर के दावों का पर्याप्त परीक्षण नहीं किया।
बागी विधायकों की सदस्यता भी विवाद के केंद्र में
पार्टी के नाम और सिंबल के विवाद के साथ बागी विधायकों की अयोग्यता का मामला भी जुड़ा हुआ है। ममता गुट की ओर से विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी समेत 10 विधायकों को दल-बदल कानून के तहत अयोग्य ठहराने की मांग की गई है।
इन विधायकों में ऋतब्रत बनर्जी के अलावा अरूप राय, फिरहाद हकीम, संदीपन साहा, अखरुज्जमान अंसारी, शिउली साहा, सबीना यास्मिन, बिप्लब मित्रा, जावेद खान और रथिन घोष शामिल हैं।
ममता गुट का तर्क है कि जब तक इन विधायकों की सदस्यता को लेकर फैसला नहीं होता, तब तक पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर अधिकार से जुड़े विवाद को अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए।
नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर भी खींचतान
दोनों गुटों के बीच टकराव विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद तक पहुंच चुका है। ममता खेमे ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय को इस पद के लिए अपना उम्मीदवार बनाया था, जबकि विधानसभा अध्यक्ष ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के तौर पर मान्यता दी।
ममता गुट ने इस फैसले को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने अगस्त में तत्काल राहत देने से इनकार करते हुए ऋतब्रत बनर्जी को फिलहाल सीमित अवधि के लिए पद पर बने रहने की अनुमति दी थी। अब यह विवाद विधायकों की अयोग्यता की कार्यवाही से भी जुड़ गया है।
नंदीग्राम में एक दिन में बदला पूरा समीकरण
6 अक्टूबर को होने वाले नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव में शुक्रवार को घटनाक्रम तेजी से बदला। ममता गुट की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने नामांकन वापस ले लिया। इससे पहले वह अपने पति सत्यजीत के साथ राज्य सचिवालय नबन्ना पहुंची थीं, जहां उन्होंने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात की। नामांकन वापस लेने की तत्काल वजह स्पष्ट नहीं हुई है।
इसके बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देने का ऐलान किया। उन्होंने कांग्रेस को ‘सिस्टर पार्टी’ बताते हुए इसे विपक्षी गठबंधन को मजबूत करने की दिशा में कदम बताया।
लेकिन समर्थन की घोषणा के कुछ ही घंटे बाद मिलन प्रधान को पश्चिम बंगाल पुलिस ने 2007 के नंदीग्राम भूमि आंदोलन से जुड़े एक पुराने हत्या मामले में गिरफ्तार कर लिया। रिपोर्टों के मुताबिक इस मामले में उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट लंबित था।
गिरफ्तारी के समय पर ममता-कांग्रेस के सवाल
मिलन प्रधान की गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस और ममता गुट ने कार्रवाई के समय पर सवाल उठाए और इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया। दूसरी ओर भाजपा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि पुलिस कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई कर रही है। इस मामले में गिरफ्तारी का आधार पुराना आपराधिक मामला और लंबित वारंट बताया गया है।
इसलिए मौजूदा स्थिति में दो अलग-अलग दावे सामने हैं—विपक्ष गिरफ्तारी के समय को राजनीतिक कार्रवाई से जोड़ रहा है, जबकि पुलिस और भाजपा की ओर से इसे कानूनी प्रक्रिया बताया जा रहा है।
1998 से चली आ रही पहचान पर पहली बार संकट
ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी। पार्टी के गठन के बाद से ‘फूल-घास’ वाला चुनाव चिह्न उसकी राजनीतिक पहचान का हिस्सा रहा है। चुनाव आयोग के मौजूदा अंतरिम आदेश के बाद पहली बार आगामी उपचुनावों में दोनों गुट इस मूल नाम और चिह्न का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे।
नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनावों के लिए अब दोनों गुट अलग-अलग नाम और प्रतीक के साथ मैदान में होंगे। ऐसे में ममता गुट के लिए सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पार्टी की मूल पहचान से जुड़े विवाद का अगला अहम कानूनी चरण बन गई है।
अब नजर सुप्रीम कोर्ट पर
ममता गुट के सामने फिलहाल तीन समानांतर मुद्दे हैं—पार्टी के मूल नाम और चुनाव चिह्न को वापस हासिल करने की कानूनी लड़ाई, बागी विधायकों की अयोग्यता का मामला और नंदीग्राम उपचुनाव में बदला हुआ चुनावी समीकरण।
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश को चुनौती दी गई है। 21 सितंबर को संभावित सुनवाई में अदालत के रुख से आगे की कानूनी प्रक्रिया की दिशा स्पष्ट हो सकती है।
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