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माता वैष्णो देवी से जुड़े ये रहस्य आज भी हैं खास, जानें पंडित श्रीधर, बाणगंगा और भैरवनाथ की पूरी कथा

October 04, 2026


नई दिल्ली: जम्मू-कश्मीर (Jammu And Kashmir) के कटरा (Katra) स्थित त्रिकुटा पर्वत पर माता वैष्णो देवी का पवित्र धाम करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। यहां एक गुफा में तीन प्राकृतिक पिंडियों के रूप में माता की पूजा की जाती है, जिन्हें महाकाली (Mahakali), महासरस्वती और महालक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है। मान्यता है कि इन तीनों शक्तियों के संयुक्त स्वरूप को माता वैष्णो देवी (Mata Vaishno Devi)कहा जाता है। इस धाम से जुड़ी पौराणिक कथाओं में पंडित श्रीधर (Pandit Shridhar) और भैरवनाथ की कथा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। माना जाता है कि पंडित श्रीधर कटरा के पास हंसली गांव में रहते थे और बेहद धार्मिक तथा सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। उनकी कोई संतान नहीं थी, जिससे वे अक्सर दुखी रहते थे।

मान्यता के अनुसार, एक बार पंडित श्रीधर ने गांव के लोगों के लिए भंडारे का आयोजन किया, लेकिन उपलब्ध सामग्री से सभी लोगों के भोजन की व्यवस्था करना मुश्किल लग रहा था। भंडारे से एक रात पहले वे इसी चिंता में सो नहीं पाए। अगले दिन पूजा के दौरान गांव के लोग पहुंचने लगे, तभी एक तेजस्वी कन्या वहां आई, जिसे वैष्णवी कहा गया। उसने भंडारे की पूरी व्यवस्था संभाल ली और सभी लोगों को भोजन करा दिया। भंडारा समाप्त होने के बाद वह अचानक गायब हो गई। कहा जाता है कि बाद में वही कन्या पंडित श्रीधर के सपने में आई और उन्हें एक पवित्र गुफा के बारे में बताया। साथ ही उन्हें संतान प्राप्ति का आशीर्वाद दिया। इसके बाद पंडित श्रीधर समझ गए कि भंडारे में आई कन्या साधारण बालिका नहीं, बल्कि माता वैष्णो देवी थीं। मान्यता है कि इसके बाद उन्होंने उस पवित्र गुफा की खोज की और यहां से माता के दर्शन की परंपरा आगे बढ़ी।

माता वैष्णो देवी से जुड़ी कथा में भैरवनाथ का प्रसंग भी महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि पंडित श्रीधर के भंडारे में गुरु गोरखनाथ और उनके शिष्य भैरवनाथ पहुंचे थे। भैरवनाथ ने वैष्णवी से मांसाहारी भोजन मांगा, लेकिन उन्होंने बताया कि ब्राह्मण के घर आयोजित भंडारे में केवल सात्विक और शाकाहारी भोजन उपलब्ध है। भैरवनाथ ने वैष्णवी को पकड़ने का प्रयास किया, जिसके बाद वह त्रिकुटा पर्वत की ओर चली गईं और भैरवनाथ भी उनके पीछे पहुंच गया। यात्रा के दौरान हनुमान जी भी माता की रक्षा के लिए उनके साथ थे। जब हनुमान जी को प्यास लगी तो माता ने धनुष से धरती पर बाण चलाया, जिससे जलधारा निकली। मान्यता है कि माता ने इसी जलधारा में अपने केश धोए थे और यह स्थान बाणगंगा कहलाया।

इसके बाद माता एक गुफा में जाकर तपस्या करने लगीं। मान्यता है कि हनुमान जी गुफा के बाहर उनकी रक्षा कर रहे थे, जबकि भैरवनाथ उनका पीछा करते हुए वहां भी पहुंच गया। एक साधु ने उसे बताया कि जिस कन्या का वह पीछा कर रहा है, वह देवी का स्वरूप है, लेकिन उसने बात नहीं मानी। कहा जाता है कि माता गुफा से दूसरे रास्ते से बाहर निकलीं और इस स्थान को अर्धकुंवारी या अर्धकुमारी कहा गया। इसके बाद माता ने अपना दिव्य स्वरूप धारण किया और भैरवनाथ को वहां से चले जाने के लिए कहा, लेकिन वह पीछे नहीं हटा। मान्यता है कि हनुमान जी और भैरवनाथ के बीच युद्ध हुआ और अंत में माता ने स्वयं बाहर आकर भैरवनाथ का वध कर दिया। भैरवनाथ का सिर जिस स्थान पर गिरा, वह भैरव घाटी कहलाया।


  • भैरवनाथ को अपनी गलती का एहसास होने पर उसने माता से क्षमा मांगी। मान्यता है कि माता ने उसे क्षमा करते हुए वरदान दिया कि जो भक्त माता के दर्शन के लिए आएगा, उसकी यात्रा भैरवनाथ के दर्शन के बिना पूर्ण नहीं मानी जाएगी। इसी वजह से श्रद्धालु माता के भवन में दर्शन के बाद भैरवनाथ मंदिर की ओर जाते हैं। इस तरह माता वैष्णो देवी की यात्रा बाणगंगा, अर्धकुंवारी, भवन और भैरव घाटी जैसे पवित्र पड़ावों से जुड़ी मानी जाती है। इन मान्यताओं के कारण यह यात्रा श्रद्धालुओं के लिए आस्था, भक्ति और आध्यात्मिक विश्वास से जुड़ी विशेष तीर्थयात्रा मानी जाती है।

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