
उज्जैन। श्राद्ध पक्ष में इन दिनों पितरों के मोक्ष और सुख-समृद्धि के लिए घरों में धूप-ध्यान, पवित्र नदियों के किनारे तर्पण-पूजन और दान-पुण्य का दौर चल रहा है। इसी श्राद्ध पक्ष से जुड़ी मालवा-निमाड़ की एक खास लोक परंपरा संजाअब उज्जैन में लगभग विलुप्त होने की कगार पर है। एक समय था जब श्राद्ध पक्ष शुरू होते ही पुराने शहर की गलियों में घरों की बाहरी दीवारों और मुख्य प्रवेश द्वार के पास संजा के मांडने नजर आने लगते थे। कुंवारी कन्याएं और महिलाएं लकड़ी के पटिए पर गोबर से रोज अलग-अलग आकृतियां बनाकर उनकी पूजा करती थीं। शाम को संजा के गीत गाए जाते और प्रसाद बांटा जाता था। पूरे 16 दिन यह परंपरा उत्सव की तरह निभाई जाती थी।
पुराने शहर में भी अब नहीं दिखते मांडने…
उज्जैन के मालीपुरा, जयसिंहपुरा, अंकपात मार्ग और आसपास के क्षेत्रों में कुछ वर्ष पहले तक संजा की यह परंपरा दिखाई देती थी। शाम होते ही महिलाएं और युवतियां संजा के सामने एकत्र होती थीं। गीत-संगीत के साथ पूजा होती थी। लेकिन पिछले करीब एक दशक में यह परंपरा लगातार कमजोर होती गई। इस बार श्राद्ध पक्ष के अंतिम दिनों में भी इन इलाकों के घरों के बाहर संजा के मांडने नजर नहीं आए।
लोक संस्कृति की पहचान थी संजा…
संजा केवल पूजा की परंपरा नहीं थी, बल्कि यह मालवा की लोक संस्कृति, महिलाओं के सामूहिक मेल-जोल और पारंपरिक गीतों से जुड़ा पर्व था। 16 दिनों तक रोज अलग आकृति बनाना, उसका पूजन करना और गीत गाना इस परंपरा की खास पहचान थी। अब मांडने और गीत दोनों कम होते जा रहे हैं, जिससे उज्जैन की यह पुरानी लोक परंपरा इतिहास के पन्नों में सिमटती नजर आ रही है।
गिनती के दिन बाकी, अमावस्या पर समापन…
श्राद्ध पक्ष अब अंतिम दौर में है। कल चौदस का श्राद्ध होगा। इसके बाद सर्वपितृ अमावस्या के साथ श्राद्ध पक्ष का समापन हो जाएगा। ऐसे में इस बार भी संजा की परंपरा को निभाने वाले घर गिनती के ही रह गए हैं। बुजुर्गों का कहना है कि नई पीढ़ी के बदलते जीवन ढंग और घर-परिवार की बदलती दिनचर्या के साथ यह लोक परंपरा धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है।
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