
नई दिल्ली. दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति एलन मस्क (Elon Musk) की कंपनी स्पेसएक्स की स्टारलिंक (Starlink) भारत (India) में सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस (Satellite Internet Service) देने के लिए कई सालों से कोशिश कर रही है. भारत का उभरता मध्य वर्ग, बड़ी आबादी और बढ़ती क्रय क्षमता किसी भी बिजनेसमैन को इंडिया नाम के मार्केट के लिए ललचाती है. मस्क का दावा है कि उसकी स्टारलिंक को 165 देशों में लाइसेंस मिला है. उसने भारत सरकार के कई नियमों का पालन किया है और इस सर्विस को देने के लिए ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहा है. फिर भी भारत सरकार स्टार लिंक को मंजूरी नहीं दे रही है.
एक रिपोर्ट के अनुसार स्टारलिंक ने 2022 में भारत में सेवा शुरू करने की कोशिश शुरू की थी. जून 2025 में उसे दूरसंचार विभाग से सैटेलाइट कम्युनिकेशन सर्विस का लाइसेंस मिला.
इसके बाद सितंबर 2025 में ट्रायल के लिए स्पेक्ट्रम दिया गया. लेकिन कमर्शियल सर्विस शुरू करने के लिए सुरक्षा मंज़ूरियों समेत कुछ और प्रक्रियाएं पूरी होना बाकी हैं.
मंत्रालय ने 8 अक्तूबर को कहा कि भारत का सैटेलाइट कम्युनिकेशन रेगुलेटरी सिस्टम निष्पक्ष और भेदभाव रहित है. सरकार का कहना है कि स्टारलिंक और दो और कंपनियां (जियो सैटेलाइट और एयरटेल की वनवेब) इस समय सुरक्षा जांच के एक जैसे रेगुलेटरी फेज में हैं. आगे 9 अक्टूबर 2026 को दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि सैटेलाइट कम्युनिकेशन के लिए स्पेक्ट्रम की कीमत तय करने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है.
अगर भारत सरकार ने सुरक्षा का हवाला देते हुए इन कंपनियों को लाइसेंस देने में देरी की है तो अरबपति मस्क की आपत्ति का कोई मतलब नहीं बनता है. देश की सुरक्षा किसी भी सरकार का सॉवरेन राइट है और इस पर रत्ती भर भी हीला-हवाली बर्दाश्त नहीं की जा सकती है.
स्टारलिंक की सर्विस को समझें
स्टारलिंक एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा है. जैसा कि नाम से ही पता चलता है ये कंपनी सैटेलाइट के जरिये इंटरनेट मुहैया कराती है.
स्टारलिंक धरती से करीब 550 किलोमीटर की ऊंचाई पर मौजूद छोटे उपग्रहों के नेटवर्क के जरिए इंटरनेट उपलब्ध कराती है. पारंपरिक सैटेलाइट इंटरनेट में उपग्रह काफी ऊंचाई पर होते हैं, जबकि स्टारलिंक के उपग्रह धरती से अपेक्षाकृत करीब हैं. इससे डेटा भेजने और प्राप्त करने में देरी यानी लेटेंसी कम होती है और वीडियो कॉलिंग, ऑनलाइन गेमिंग और वीडियो स्ट्रीमिंग जैसी सेवाएं बेहतर तरीके से चल सकती हैं.
इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इंटरनेट कनेक्शन के लिए मोबाइल टावर या जमीन के नीचे बिछे फाइबर केबल पर निर्भरता नहीं होती. यूजर को एक विशेष डिश और राउटर की जरूरत होती है, जो सैटेलाइट से कनेक्ट होकर इंटरनेट उपलब्ध कराते हैं. इससे पहाड़ों, दूरदराज के गांवों, समुद्री इलाकों और आपदा प्रभावित क्षेत्रों में भी कनेक्टिविटी देना संभव है.
इसी खासियत को मस्क अपनी कंपनी की सबसे बड़ी USP बताता है. एलन मस्क का दावा है कि इसके जरिये भारत के दूरदराज के इलाकों में भी बिना केबल बिछाए इंटरनेट सेवा दी जा सकती है.
लेकिन इंटरनेट की ये निर्बाध सप्लाई भारत जैसे देश में सुरक्षा का भी सवाल खड़ा करती है. इसलिए भारत सिक्योरिटी इश्यू को ध्यान में रखकर धीरे-धीरे कदम बढ़ा रहा है.
भारत ही नहीं अमेरिका भी सुरक्षा के मामलों में काफी सख्त मानक रखता है.
अमेरिका ने कुछ देशों से जुड़ी कंपनियों, तकनीकों और सर्विसेज पर राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं. खास तौर पर चीन की दूरसंचार और निगरानी तकनीक को लेकर अमेरिकी सरकार का रुख सख्त रहा है. अमेरिका की चिंता यह है कि विदेशी सरकारें अपने देश की कंपनियों के जरिये संवेदनशील नेटवर्क, सरकारी संचार और नागरिकों के डेटा तक पहुंच हासिल कर सकती हैं. और इसका बेजा इस्तेमाल कर सकती हैं.
दरअसल दूरसंचार नेटवर्क, सैटेलाइट और इंटरनेट सेवाएं सिर्फ कारोबार का जरिया नहीं हैं, बल्कि युद्ध, खुफिया जानकारी और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ी हैं. इसीलिए अमेरिकी नीति में कंपनी की राष्ट्रीयता, उसके स्वामित्व और संबंधित सरकार के संभावित प्रभाव को अहमियत दी जाती है.
अमेरिका में इन मुख्य टेक कंपनियों पर है रोक
राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए अमेरिका ने दुनिया की कई बड़ी टेक कंपनियों पर प्रतिबंध लगा रखा है. इनमें ज्यादातर चीनी कंपनियां शामिल हैं. चीन अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी है. अमेरिका ने इन कंपनियों के प्रोडक्ट और सेवाओं का अमेरिकी सरकार, सैन्य प्रतिष्ठानों और क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर में इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया गया है.
इस लिस्ट में सबसे बड़ा नाम है चीनी टेक दिग्गज हुआवेई.
अमेरिका ने 2019 से ही इस कंपनी के 5जी नेटवर्क उपकरण, टेलीकॉम गियर और स्मार्टफोन पर सख्ती कर दी है. अमेरिकी टेलीकॉम कंपनियां और सरकारी एजेंसियां हुआवेई के किसी भी उपकरण का इस्तेमाल नहीं करतीं. नए फोन में गूगल की सेवाएं भी उपलब्ध नहीं हैं, जिससे कंपनी का अमेरिकी बाजार लगभग खत्म हो चुका है.
सितंबर 2026 में न्यूयॉर्क की अदालत में हुआवेई ने कहा कि यह मामला प्रतिस्पर्धा का है, साजिश का नहीं. उन्होंने जोर दिया कि यह नवाचार का मामला है, चोरी का नहीं और सामान्य कारोबारी लेन-देन को आपराधिक बताने की कोशिश की जा रही है.
दूसरी कंपनी जेडटीई है. इस पर भी टेलीकॉम उपकरण और मोबाइल डिवाइस बेचने पर रोक है. अमेरिकी सरकारी नेटवर्क और बड़े टेलीकॉम ऑपरेटर्स जेडटीई के किसी भी उपकरण का इस्तेमाल नहीं करते. नए मॉडल की मंजूरी और बिक्री लगभग बंद है.
2019 में डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने हुआवेई को ‘एंटिटी लिस्ट’ में डाला. इससे अमेरिकी कंपनियों के साथ व्यापार पर प्रतिबंध लग गया. बाद में एफसीसी ने हुआवेई और जेडटीई के टेलीकॉम उपकरण अमेरिका में बेचने पर रोक लगा दी. इसका कारण बताया गया राष्ट्रीय सुरक्षा. अमेरिका का तर्क है कि इन कंपनियों के चीनी सरकार और कम्युनिस्ट पार्टी से कथित संबंध हैं, जिससे जासूसी या बैकडोर एंट्री का खतरा हो सकता है.
तीसरी प्रमुख कंपनी हिकविजन है, जो दुनिया की सबसे बड़ी सर्विलांस कैमरा निर्माता मानी जाती है. अमेरिका सरकारी इमारतों, सैन्य ठिकानों, हवाई अड्डों और संवेदनशील जगहों पर इसके कैमरे लगाने पर पाबंदी लगा दी है. नए मॉडल की बिक्री और आयात भी प्रतिबंधित है.
चौथी कंपनी रूसी कास्परस्की है. एंटीवायरस सॉफ्टवेयर की यह दिग्गज कंपनी अमेरिकी सरकारी कंप्यूटर सिस्टम से पूरी तरह बाहर कर दी गई है. 2024 में अमेरिकी कॉमर्स डिपार्टमेंट ने निजी क्षेत्र में भी इसके नए लाइसेंस और सेवाओं पर प्रभावी रोक लगा दी. अब अमेरिकी एजेंसियां और कई संगठन कास्परस्की का कोई भी सॉफ्टवेयर इस्तेमाल नहीं करते.
पांचवीं कंपनी टिकटॉक है. जिससे भारत के लोग भी परिचित हैं. इस मालिक चीनी कंपनी बाइटडांस है. अमेरिकी संघीय सरकार, सेना और कई राज्य सरकारों के आधिकारिक मोबाइल फोन और कंप्यूटर पर टिकटॉक ऐप पूरी तरह बैन है. आम नागरिक अभी इसे इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन इसे बेचने या बंद करने का कानूनी दबाव लगातार बना हुआ है.
अमेरिका का मुख्य तर्क है कि विदेशी कंपनियों द्वारा नियंत्रित ऐप्स यूजर डेटा और कंटेंट हेरफेर के जरिए राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं.
चीन को रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानते हुए अमेरिका सेमीकंडक्टर, एआई और टेलीकॉम जैसे क्षेत्रों में ‘डिकपलिंग’ की नीति अपना रहा है. यानी कि इन सेक्टर में एक-दूसरे पर निर्भरता घटाकर अपनी सप्लाई चेन, तकनीक, चिप्स, टेलीकॉम और महत्वपूर्ण उद्योगों को स्वतंत्र बनाने की कोशिश कर रहा है.
अमेरिका इन कार्रवाइयों में पूरी पारदर्शिता नहीं दिखाता है. कई मामलों में ठोस सार्वजनिक सबूत सीमित होते हैं और फैसले रणनीतिक हितों से प्रेरित लगते हैं. अमेरिका खुद अपनी कंपनियों को दुनिया भर में विस्तार करने देता है, लेकिन विदेशी कंपनियों पर सख्ती बरतता है।
भारत की सुरक्षा चिंताएं अहम
भारत सरकार के मुताबिक स्टारलिंक अकेली ऐसी कंपनी नहीं है जिसकी जांच हो रही है. भारती समूह से जुड़ी यूटेलसैट वनवेब और रिलायंस समूह की जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस भी सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं शुरू करने के लिए मंजूरियों की प्रक्रिया से गुजर रही हैं.
स्टारलिंक के मामले में एक अहम सवाल यह भी है कि इंडियन यूजर का डेटा किस रास्ते से गुजरेगा और सरकार जरूरत पड़ने पर नेटवर्क की निगरानी या किसी खास इलाके में सर्विसेज सीमित करने का निर्देश कैसे लागू करा सकेगी. भारतीय अधिकारियों की चिंता यह सुनिश्चित करना है कि मस्क के नेटवर्क की ग्लोबल मौजूदगी के बावजूद भारत अपने सुरक्षा नियमों को कैसे प्रभावी ढंग से लागू करे.
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