वाशिंगटन। संयुक्त राष्ट्र महासभा (United Nations General Assembly) में क्यूबा (Cuba) पर लगाए गए अमेरिकी आर्थिक और व्यापारिक प्रतिबंधों (trade restrictions) को समाप्त करने के प्रस्ताव पर भारत ने क्यूबा का समर्थन किया। बुधवार को हुए मतदान में भारत समेत 130 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया, जबकि अमेरिका और इजरायल सहित 17 देशों ने इसका विरोध किया। वहीं, 25 देश मतदान से दूर रहे। हालांकि, पिछले वर्ष की तुलना में प्रस्ताव के समर्थन में कम वोट पड़े। अमेरिका ने इसे अपनी कूटनीतिक सफलता बताया, जबकि क्यूबा ने आरोप लगाया कि वाशिंगटन आर्थिक प्रतिबंधों के जरिए उसके नागरिकों की मुश्किलें बढ़ा रहा है।
इस पर वॉल्ट्ज ने कहा, ”यह संयुक्त राष्ट्र है, आपकी कम्युनिस्ट तानाशाही नहीं। आप मुझे चुप नहीं करा सकते।” इसके जवाब में क्यूबा के विदेश मंत्री ने अमेरिकी राजदूत को झूठा बताया। दोनों पक्षों के बीच विवाद बढ़ने के बाद संयुक्त राष्ट्र की कार्यवाही कुछ समय के लिए रोकनी पड़ी।
क्यूबा ने अमेरिका पर सदस्य देशों को प्रस्ताव के खिलाफ मतदान करने के लिए दबाव डालने का आरोप भी लगाया। क्यूबा के मुताबिक, कुछ देशों को वीजा प्रतिबंधों और आर्थिक पाबंदियों की धमकी दी गई थी।
संयुक्त राष्ट्र महासभा में क्यूबा पर अमेरिकी प्रतिबंध समाप्त करने का प्रस्ताव हर साल पेश किया जाता है। इस बार इसके समर्थन में 130 देशों ने मतदान किया, जबकि पिछले वर्ष समर्थन करने वाले देशों की संख्या इससे अधिक थी। इस बार अमेरिका और इजरायल सहित 17 देशों ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया तथा 25 देश मतदान से दूर रहे।
जर्मनी और इटली जैसे देशों का मतदान से दूरी बनाना भी चर्चा का विषय रहा। अमेरिकी राजदूत माइक वॉल्ट्ज ने कहा कि दक्षिण कोरिया और जर्मनी जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं सहित कई देशों के रुख में बदलाव से अमेरिका को संतोष है।
अमेरिका वर्ष 1992 से लगभग हर साल इस प्रस्ताव का विरोध करता आया है। हालांकि, वर्ष 2016 में तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में अमेरिका ने मतदान से दूरी बनाई थी। उस समय दोनों देशों के संबंध सुधारने की कोशिशें चल रही थीं।
भारत ने प्रस्ताव के समर्थन में मतदान कर क्यूबा पर अमेरिकी प्रतिबंधों के खिलाफ अपना रुख स्पष्ट किया। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र महासभा का यह प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है। इसका अर्थ है कि मतदान के आधार पर अमेरिका को प्रतिबंध हटाने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं किया जा सकता।
अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाने के लिए वहां की घरेलू कानूनी प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है। इनमें कई प्रतिबंधों को समाप्त करने में अमेरिकी कांग्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण है।
क्यूबा के विदेश मंत्री ब्रूनो रोड्रिगेज ने अमेरिका पर प्रतिबंधों के जरिए देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने का आरोप लगाया। क्यूबा लंबे समय से दावा करता रहा है कि अमेरिकी पाबंदियों के कारण जरूरी वस्तुओं की कमी, महंगाई और ऊर्जा संकट गंभीर हुए हैं।
हाल के महीनों में ईंधन की कमी और लंबे बिजली कटौती ने भी क्यूबा के नागरिकों की परेशानियां बढ़ाई हैं। क्यूबा सरकार इन समस्याओं के लिए अमेरिकी प्रतिबंधों को जिम्मेदार ठहराती है, जबकि अमेरिका अपनी नीतियों का बचाव करते हुए क्यूबा की सरकार के शासन और मानवाधिकार रिकॉर्ड पर सवाल उठाता रहा है।
संयुक्त राष्ट्र में हुए मतदान से स्पष्ट है कि क्यूबा पर प्रतिबंधों को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में समर्थन और असहमति दोनों मौजूद हैं। भारत का वोट क्यूबा के पक्ष में रहा, लेकिन प्रस्ताव के गैर-बाध्यकारी होने के कारण अमेरिकी प्रतिबंधों पर तत्काल बदलाव की कोई गारंटी नहीं है।
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