
डेस्क: इजराइल में चुनावी नतीजे आने के बाद अब प्रधानमंत्री की कुर्सी को लेकर पेच फंस गया है. न तो वर्तमान प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के पास पीएम बनने के लिए बहुमत है और न ही उनके धुर विरोधी गादी आइजनकोट के पास. आइजनकोट के पास अरब पार्टियों से समर्थन लेने का रास्ता खुला है, लेकिन इसकी गुंजाइश कम है. ऐसे में अब सबकी नजर अमेरिका पर है.
दो दिन पहले वाशिंगटन पोस्ट ने एक रिपोर्ट की थी. इसके मुताबिक व्हाइट हाउस बेंजामिन और आइजनकोट के बीच सुलह कराने में जुटा है. व्हाइट हाउस चाहता है कि इजराइल में दक्षिणपंथी पार्टियों की सरकार हो. अरब पार्टियों के दखल से उसका समीकरण खराब हो सकता है.
दोनों नेताओं ने संकेत दिए
इजराइल में इस बात की चर्चा तेज है. इसकी 2 वजहें हैं. पहली वजह- नेतन्याहू और आइजनकोट दोनों की विचारधारओं का एक होना है. दूसरी वजह अमेरिका का दबाव है. इजराइल खुद से कोई फैसला नहीं ले सकता है. चुनाव के आखिरी वक्त में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेल अवीव में दखल दिया. ट्रंप के कारण नेतन्याहू बुरी तरह चुनाव हार रहे थे, लेकिन मैंने उनका समर्थन कर उन्हें जीत की स्थिति में ला दिया. इस वक्त मिडिल ईस्ट का जो सिनेरियो है, उसमें इजराइल के लिए अमेरिका का विरोध खासकर ट्रंप का विरोध मुमकिन नहीं है.
अगर इजराइल में सरकार का गठन नहीं होता है तो फिर से चुनाव की घोषणा हो सकती है. यह आइजनकोट के लिए घातक साबित हो सकता है. नेतन्याहू चुनाव के बाद अपनी स्थिति और मजबूत कर सकते हैं. वहीं अरब पार्टियों के उभार ने इजराइल के यहूदियों को सकते में ला दिया है. पहली बार अरब पार्टियों की स्थिति मजबूत है. नेतन्याहू ने अरब पार्टियों पर चुनाव चुराने का आरोप लगाया है. आने वाले वक्त में इजराइल में यह बड़ा मुद्दा बन सकता है.
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