
नई दिल्ली ।इस साल धनतेरस (Dhanteras) का पर्व 6 नवंबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस बार त्योहार पर शुक्र प्रदोष (Shukra Pradosh) का विशेष संयोग बन रहा है। शुक्रवार का दिन माता महालक्ष्मी (Goddess Mahalakshmi) को समर्पित माना जाता है, जबकि धनतेरस पर भगवान कुबेर (Lord Kubera), भगवान धन्वंतरि (Lord Dhanvantari) और मां लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व है। ऐसे में इस दिन धार्मिक पूजा के साथ सोना-चांदी और अन्य शुभ वस्तुओं की खरीदारी को लेकर भी लोगों में उत्साह रहेगा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, धनतेरस पर प्रदोष काल में पूजा करना विशेष फलदायी माना जाता है। इस वर्ष प्रदोष काल शाम 5 बजकर 49 मिनट से शुरू होकर रात 8 बजकर 23 मिनट तक रहेगा। इस तरह श्रद्धालुओं को पूजा-अर्चना के लिए लगभग ढाई घंटे का समय मिलेगा। इस अवधि में भगवान कुबेर, मां लक्ष्मी और भगवान धन्वंतरि की आराधना की जा सकती है।
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, शुक्र प्रदोष का संयोग इस पर्व के धार्मिक महत्व को और विशेष बनाता है। शुक्रवार को माता लक्ष्मी की पूजा का दिन माना जाता है। वहीं, धनतेरस पर धन और आरोग्य से जुड़े देवताओं की उपासना की परंपरा है। इसी कारण इस दिन शाम के प्रदोष काल में पूजा करने को प्राथमिकता दी जाती है।
धनतेरस पर खरीदारी के लिए भी अलग-अलग शुभ समय बताए गए हैं। शुभ चौघड़िया मुहूर्त सुबह 8 बजकर 16 मिनट से 9 बजकर 48 मिनट तक रहेगा। इसके बाद अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 48 मिनट से दोपहर 12 बजकर 56 मिनट तक रहेगा। वहीं, शाम का प्रदोष काल 5 बजकर 49 मिनट से रात 8 बजकर 23 मिनट तक रहेगा। श्रद्धालु अपनी सुविधा और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन समयों में खरीदारी तथा पूजा की योजना बना सकते हैं।
धनतेरस पर सोना और चांदी खरीदने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। धार्मिक मान्यताओं में माता महालक्ष्मी के स्वर्ण स्वरूप और चांदी से जुड़े स्वरूप का उल्लेख मिलता है। इसी वजह से इस अवसर पर सोने-चांदी के आभूषण और अन्य वस्तुएं खरीदना शुभ माना जाता है। हालांकि, कीमती धातुएं खरीदना हर व्यक्ति के बजट में संभव नहीं होता। ऐसे में अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार पीतल या तांबे के बर्तन भी खरीदे जा सकते हैं।
इसके अलावा धनतेरस पर खील और साबुत धनिया खरीदने की भी परंपरा है। इन्हें शुभ वस्तुओं के रूप में देखा जाता है। इस तरह त्योहार पर खरीदारी के लिए केवल महंगी वस्तुओं को ही जरूरी नहीं माना जाता, बल्कि लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार परंपरा से जुड़ी चीजें घर लाते हैं।
धनतेरस को धन त्रयोदशी भी कहा जाता है। इस पर्व का संबंध भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य से जुड़ी पौराणिक कथा से है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उन्हें आयुर्वेद का प्रवर्तक और आरोग्य का देवता माना जाता है। उनके हाथ में मौजूद अमृत कलश जीवन की रक्षा और अमरत्व का प्रतीक माना जाता है।
समुद्र मंथन की यह कथा श्रीमद्भागवत पुराण के अष्टम स्कंध में भी वर्णित है। इसी मान्यता के चलते धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा की जाती है। श्रद्धालु उनसे अच्छे स्वास्थ्य, निरोगी जीवन और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं। इस प्रकार धनतेरस का पर्व केवल धन और खरीदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें समृद्धि, स्वास्थ्य और धार्मिक आस्था का भी विशेष महत्व जुड़ा हुआ है।
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