
नई दिल्ली । दीपावली (Diwali)का त्योहार केवल दीप जलाने (Lighting lamps)और मां लक्ष्मी (Goddess Lakshmi)की पूजा करने तक सीमित नहीं है बल्कि इसके पांच दिनों में कई ऐसी धार्मिक परंपराएं (religious practices)निभाई जाती हैं जिनका विशेष महत्व बताया गया है। इन्हीं में से एक है नरक चतुर्दशी (Naraka Chaturdashi)पर किया जाने वाला अभ्यंग स्नान। इसे छोटी दिवाली और रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन सूर्योदय से पहले शरीर पर तिल का तेल लगाकर स्नान करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि जो व्यक्ति नरक चतुर्दशी पर अभ्यंग स्नान नहीं करता उसे नरक की प्राप्ति होती है। इसी मान्यता के कारण इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। साल 2026 में अभ्यंग स्नान 8 नवंबर की सुबह किया जाएगा।
हिंदू धर्म में अभ्यंग स्नान को शरीर और मन की शुद्धि से जोड़कर देखा जाता है। अभ्यंग का अर्थ है शरीर पर तेल लगाकर मालिश करना और फिर विधिपूर्वक स्नान करना। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तिल के तेल में मां लक्ष्मी का वास होता है जबकि जल में मां गंगा का निवास माना गया है। इसलिए नरक चतुर्दशी पर सूर्योदय से पहले तिल के तेल से शरीर की मालिश करके स्नान करना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस परंपरा को निभाने से नकारात्मकता दूर होती है और जीवन में सुख समृद्धि का आगमन होता है।
इस दिन स्नान के बाद यमराज का स्मरण करने की भी परंपरा है। धार्मिक विधि के अनुसार यमराज के 14 नामों का स्मरण करते हुए जल अर्पित किया जाता है। इसके साथ ही शाम के समय यमराज के नाम का दीपक जलाने का विधान है। इसे यम दीपदान कहा जाता है। धार्मिक विश्वास है कि ऐसा करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और परिवार के सदस्यों को लंबी आयु का आशीर्वाद मिलता है। नरक चतुर्दशी पर दीपदान करने की परंपरा भी इसी मान्यता से जुड़ी हुई है।
अभ्यंग स्नान का महत्व केवल धार्मिक मान्यताओं तक ही सीमित नहीं है बल्कि आयुर्वेद में भी तेल मालिश को शरीर की देखभाल का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। आयुर्वेदिक परंपरा के अनुसार तिल का तेल वात दोष को शांत करने में सहायक माना जाता है। शरीर पर तेल लगाने और मालिश करने से त्वचा का रूखापन कम करने तथा नमी बनाए रखने में मदद मिल सकती है। इससे शरीर को आराम मिलता है और थकान कम महसूस हो सकती है। चरक संहिता में भी अभ्यंग के लाभों का उल्लेख मिलता है। इसमें तेल मालिश को शरीर की थकान दूर करने और वात को शांत करने वाला बताया गया है।
ज्योतिषीय मान्यताओं में तिल के तेल का संबंध शनि देव से भी माना जाता है। शनि को आयु और परिश्रम से जोड़कर देखा जाता है। यही कारण है कि शनि की शांति के लिए तिल के तेल का दान करना और दीपक जलाना शुभ माना जाता है। नरक चतुर्दशी पर तिल के तेल से मालिश करने की परंपरा को भी कुछ लोग इसी मान्यता से जोड़ते हैं।
नरक चतुर्दशी का संदेश केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है बल्कि यह शरीर की देखभाल और जीवन में सकारात्मकता बनाए रखने की प्रेरणा भी देता है। इस दिन तिल के तेल से मालिश करना स्नान करना यमराज का स्मरण करना और दीपदान करना प्रमुख परंपराएं हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन नियमों का पालन करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति और सुख समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। हालांकि नरक प्राप्ति जैसी बातें धार्मिक विश्वासों का हिस्सा हैं। इन्हें प्रमाणित वैज्ञानिक तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।
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