
नई दिल्ली ।धनतेरस (Dhanteras) का त्योहार आते ही घरों और बाजारों में रौनक बढ़ने लगती है। इस दिन लोग सोने-चांदी(Gold And Silver) के आभूषण, सिक्के, बर्तन और पूजा से जुड़ी वस्तुओं की खरीदारी करते हैं। इसके साथ ही देवी-देवताओं की मूर्तियां खरीदने की परंपरा भी निभाई जाती है। हालांकि, धनतेरस पर पूजा के लिए भगवान धन्वंतरि (Lord Dhanvantari) और भगवान कुबेर (Lord Kubera) में से किसकी मूर्ति घर लानी चाहिए, इसे लेकर कई लोगों के मन में सवाल रहता है। धार्मिक मान्यताओं (Religious Beliefs) के अनुसार, दोनों देवताओं का इस पर्व से विशेष संबंध है, लेकिन उनकी पूजा का उद्देश्य अलग-अलग माना जाता है।
भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद और चिकित्सा का देवता माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उनके प्राकट्य को स्वास्थ्य, जीवन और आरोग्य से जोड़कर देखा जाता है। इसी कारण धनतेरस को धन्वंतरि जयंती और धनत्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन उनकी पूजा करने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है।
भगवान धन्वंतरि की पूजा मुख्य रूप से अच्छे स्वास्थ्य, लंबी आयु और निरोगी जीवन की कामना के लिए की जाती है। मान्यता है कि स्वस्थ शरीर जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति है। इसलिए जो परिवार स्वास्थ्य और पारिवारिक खुशहाली को विशेष महत्व देते हैं, वे धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा करते हैं। उनकी मूर्ति या तस्वीर घर के पूजा स्थल पर स्थापित कर श्रद्धापूर्वक आराधना की जा सकती है।
वहीं, भगवान कुबेर को धन-संपत्ति और वैभव का देवता माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में उन्हें देवताओं का कोषाध्यक्ष और धन का संरक्षक बताया गया है। उनकी पूजा आर्थिक स्थिरता, समृद्धि और सुख-शांति की कामना से जुड़ी हुई है। धनतेरस पर कुबेर की आराधना करने की परंपरा भी काफी पुरानी मानी जाती है।
विशेष रूप से व्यापारी और कारोबारी इस दिन भगवान कुबेर की पूजा करते हैं। कई लोग अपनी तिजोरी, धन और व्यापार से जुड़ी वस्तुओं के साथ उनकी आराधना करते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि कुबेर की कृपा से घर में धन-धान्य और आर्थिक संपन्नता बनी रहती है। यही वजह है कि धनतेरस के अवसर पर कुबेर की मूर्तियों और तस्वीरों की खरीदारी भी की जाती है।
धन्वंतरि और कुबेर के महत्व को समझें तो दोनों की पूजा के उद्देश्य में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। भगवान धन्वंतरि स्वास्थ्य, आयुर्वेद और निरोगी जीवन के प्रतीक हैं, जबकि कुबेर धन, संपत्ति और आर्थिक समृद्धि से जुड़े माने जाते हैं। इसलिए इन दोनों देवताओं को एक-दूसरे का विकल्प मानने के बजाय उनकी अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं को समझना चाहिए।
अब सवाल है कि धनतेरस पर इन दोनों में से किसकी मूर्ति खरीदना ज्यादा शुभ माना जाता है? धार्मिक परंपराओं में किसी एक देवता की मूर्ति खरीदना अनिवार्य नहीं बताया गया है। श्रद्धालु अपनी आस्था, पारिवारिक परंपरा और पूजा की व्यवस्था के अनुसार भगवान धन्वंतरि या कुबेर में से किसी की भी मूर्ति घर ला सकते हैं। जिन परिवारों की इच्छा हो, वे दोनों देवताओं की मूर्तियां या तस्वीरें स्थापित करके भी पूजा कर सकते हैं।
मूर्ति खरीदते समय कुछ सामान्य बातों का ध्यान रखना भी जरूरी है। मूर्ति की बनावट, गुणवत्ता और साफ-सफाई अच्छी होनी चाहिए। उसका आकार ऐसा हो, जिसे घर के पूजा स्थल पर आसानी से रखा जा सके। केवल महंगी मूर्ति खरीदना जरूरी नहीं है। अपनी आर्थिक क्षमता और पसंद के अनुसार खरीदारी करना बेहतर माना जाता है।
अगर मूर्ति खरीदना संभव नहीं है तो तस्वीर के माध्यम से भी श्रद्धापूर्वक पूजा की जा सकती है। धनतेरस का धार्मिक महत्व केवल खरीदारी तक सीमित नहीं है। इस अवसर पर स्वास्थ्य और समृद्धि दोनों के लिए प्रार्थना की जाती है। ऐसे में भगवान धन्वंतरि और कुबेर की पूजा को अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार महत्व दिया जा सकता है।
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