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फिल्म बेचने के लिए डर का ऐसा खेल, प्रमोशन देखकर सहम गए लोग, जानिए सिनेमा के 5 सबसे खौफनाक कैंपेन

October 07, 2026

नई दिल्ली। फिल्मों की कहानी (Movie storylines)और कलाकारों के अलावा उनका प्रमोशन(Promotion) भी दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने में अहम भूमिका निभाता है। आमतौर पर फिल्म निर्माता पोस्टर ट्रेलर इवेंट(Filmmaker Poster Trailer Event) और सोशल मीडिया कैंपेन के जरिए अपनी फिल्मों को दर्शकों तक पहुंचाते हैं। लेकिन हॉरर फिल्मों के मेकर्स ने कई बार प्रमोशन का ऐसा तरीका अपनाया जिसने फिल्म देखने से पहले ही लोगों के बीच डर का माहौल बना दिया। कुछ प्रमोशन इतने वास्तविक लगे कि लोगों को समझ ही नहीं आया कि वे किसी फिल्म के प्रचार का हिस्सा हैं या सचमुच किसी खतरनाक घटना के बीच फंस गए हैं। सिनेमा इतिहास में ऐसे कई प्रमोशन दर्ज हैं जिन्हें आज भी बेहद यादगार माना जाता है।

साल 1960 में रिलीज हुई अल्फ्रेड हिचकॉक की फिल्म साइको के प्रमोशन को इस तरह के प्रयोगों की शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है। फिल्म को लेकर दर्शकों में डर का माहौल बनाने के लिए सिनेमाघरों के बाहर डॉक्टरों और नर्सों जैसी वेशभूषा में लोगों को तैनात किया गया था। दर्शकों को फिल्म की भयावहता को लेकर चेतावनी दी जाती थी। इसके साथ ही फिल्म शुरू होने के बाद देर से आने वाले दर्शकों को प्रवेश नहीं देने का नियम भी प्रचार का हिस्सा बना। इस माहौल ने लोगों की उत्सुकता के साथ डर भी बढ़ा दिया।

इसके बाद साल 1999 में आई द ब्लेयर विच प्रोजेक्ट ने गुरिल्ला मार्केटिंग का बेहद अलग तरीका अपनाया। फिल्म के निर्माताओं ने इंटरनेट पर ऐसा माहौल तैयार किया जिससे लोगों को लगा कि फिल्म में दिखाई गई घटनाएं वास्तविक हैं। कॉलेज कैंपस और सिनेमाघरों के आसपास फिल्म के कलाकारों के लापता होने वाले पोस्टर लगाए गए। वेबसाइट पर भी कहानी को इस तरह पेश किया गया कि कई लोगों को शुरुआत में यह फिल्म नहीं बल्कि वास्तविक घटना लगी। इस अभियान ने फिल्म को लेकर जबरदस्त चर्चा पैदा की।

साल 2006 में मिशन इम्पॉसिबल 3 के प्रमोशन के दौरान भी एक ऐसा मामला सामने आया जिसने लोगों को डरा दिया। फिल्म की थीम ट्यून बजाने वाले छोटे डिजिटल म्यूजिक प्लेयर अखबारों के बॉक्स के अंदर लगाए गए थे। बॉक्स खोलते ही अचानक आवाज आने लगी। अंदर दिखाई देने वाले तारों और अचानक बजने वाली धुन से कुछ लोगों को लगा कि वहां कोई संदिग्ध उपकरण रखा गया है। मामला इतना गंभीर हो गया कि कुछ स्थानों पर सुरक्षा एजेंसियों को बुलाना पड़ा और बम निरोधक दस्ते तक को सक्रिय करना पड़ा।

साल 2013 में आई एक हॉरर फिल्म के प्रमोशन के लिए न्यूयॉर्क की एक कॉफी शॉप में भी डरावना प्रैंक किया गया। वहां छिपे हुए तारों रिमोट से चलने वाली कुर्सियों और नकली दीवारों की मदद से ऐसा माहौल तैयार किया गया कि आम ग्राहक अचानक डर गए। एक अभिनेत्री ने अपनी कथित मानसिक शक्ति से चीजों को हिलाने का अभिनय किया। टेबल और कुर्सियों के अचानक हिलने से वहां मौजूद लोग चीखते हुए बाहर निकल गए।


  • इसके बाद स्माइल और स्माइल 2 के प्रमोशन ने भी लोगों का ध्यान खींचा। इन फिल्मों के प्रचार के दौरान लाइव बेसबॉल मैचों और टीवी कार्यक्रमों में डरावनी मुस्कान वाले लोगों को दर्शकों के बीच बैठाया गया। वे लंबे समय तक कैमरे की तरफ बिना पलक झपकाए देखते रहे। टीवी पर यह दृश्य देखकर लोगों को कुछ पल के लिए समझ नहीं आया कि यह किसी फिल्म का प्रमोशन है या वास्तविक घटना। इन सभी उदाहरणों से साफ है कि फिल्म प्रमोशन अब केवल पोस्टर और ट्रेलर तक सीमित नहीं रहा। मेकर्स दर्शकों को कहानी का अनुभव पहले ही कराने के लिए डर और रोमांच को प्रचार का हिस्सा बना चुके हैं।

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