श्योपुर। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (President Draupadi Murmu) के कूनो नेशनल पार्क (Coono National Park) दौरे के दौरान एशियाई शेरों (Asian lions) की बसावट का मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है। श्योपुर (Shyopur) में कूनो संघर्ष समिति ने धरना-प्रदर्शन कर राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा और मांग की कि कूनो को उसके मूल उद्देश्य के अनुरूप एशियाई शेरों का दूसरा घर बनाया जाए।
समिति का कहना है कि कूनो परियोजना की शुरुआत ही एशियाई शेरों के पुनर्वास के लिए की गई थी। इसके लिए वर्षों पहले 25 गांवों के हजारों लोगों का विस्थापन किया गया था। ऐसे में अब तक शेरों की बसावट नहीं होना स्थानीय लोगों के त्याग और परियोजना की मूल भावना के साथ न्याय नहीं माना जा सकता।
रविवार को श्योपुर के गांधी पार्क में कूनो संघर्ष समिति के बैनर तले सत्याग्रह और धरना आयोजित किया गया। समिति के संयोजक एवं कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष अतुल चौहान के नेतृत्व में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया। प्रदर्शनकारियों ने जिला प्रशासन के माध्यम से राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजकर कूनो में एशियाई शेरों को बसाने की प्रक्रिया जल्द शुरू करने की मांग की।
ज्ञापन में कहा गया कि भारतीय वन्यजीव संस्थान के सर्वेक्षण के बाद वर्ष 1993-94 में कूनो क्षेत्र को एशियाई शेरों के पुनर्वास के लिए सबसे उपयुक्त स्थान माना गया था। इसी योजना को अमल में लाने के लिए कूनो के आसपास बसे 25 गांवों के लगभग 4545 परिवारों को पुनर्वासित किया गया था, ताकि वन क्षेत्र को मानवीय हस्तक्षेप से मुक्त रखा जा सके और शेरों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार हो।
संघर्ष समिति का तर्क है कि गुजरात के गिर क्षेत्र में एशियाई शेरों की संख्या लगातार बढ़ रही है। किसी प्राकृतिक आपदा, महामारी या अन्य जोखिम की स्थिति में पूरी प्रजाति पर खतरा उत्पन्न हो सकता है। इसलिए शेरों के लिए एक वैकल्पिक और सुरक्षित आवास विकसित करना वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से जरूरी है।
समिति ने यह भी याद दिलाया कि वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने एशियाई शेरों को राष्ट्रीय धरोहर बताते हुए उन्हें कूनो में स्थानांतरित करने संबंधी निर्देश दिए थे।
आंदोलनकारियों का कहना है कि वर्तमान में चल रही चीता परियोजना और एशियाई शेरों के पुनर्वास को एक-दूसरे का विरोधी नहीं माना जाना चाहिए। उनका दावा है कि वैज्ञानिक प्रबंधन और उचित योजना के साथ दोनों प्रजातियों का संरक्षण एक ही परिक्षेत्र में संभव है।
समिति का मानना है कि यदि कूनो में शेरों की बसावट होती है तो राष्ट्रीय उद्यान की अंतरराष्ट्रीय पहचान और मजबूत होगी तथा वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में भारत को नई उपलब्धि मिलेगी।
कूनो संघर्ष समिति के संयोजक अतुल चौहान ने कहा कि हजारों परिवारों ने शेर परियोजना के लिए अपने गांव छोड़े थे। अब समय आ गया है कि कूनो को उसका वास्तविक उद्देश्य मिले। उन्होंने राष्ट्रपति से इस मामले में हस्तक्षेप कर केंद्र सरकार को आवश्यक कदम उठाने के निर्देश देने की मांग की।
समिति का मानना है कि एशियाई शेरों के आने से श्योपुर और आसपास के क्षेत्रों में पर्यटन गतिविधियों को नई रफ्तार मिलेगी। इससे स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को भी लाभ होगा।
राष्ट्रपति के दौरे के दौरान उठी इस मांग ने एक बार फिर कूनो में एशियाई शेरों की बसावट को लेकर बहस को तेज कर दिया है। अब सबकी नजर केंद्र सरकार और वन्यजीव संरक्षण से जुड़ी एजेंसियों के अगले कदम पर टिकी है।
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