नई दिल्ली। पश्चिम एशिया (West Asia) में जारी तनाव और बढ़ती महंगाई के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian GDP) पर नया दबाव बनता दिख रहा है। एक ताजा रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि अगर अल-नीनो का असर मानसून और कृषि उत्पादन पर पड़ा, तो महंगाई और उपभोक्ता मांग दोनों प्रभावित हो सकते हैं। इससे भारत की अर्थव्यवस्था पर करीब 4 से 5 लाख करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ने की संभावना है।
ब्रोकरेज फर्म Prabhudas Lilladher की रिपोर्ट के अनुसार, अल-नीनो और वैश्विक महंगाई का संयुक्त असर 2027 की दूसरी तिमाही से उपभोक्ता मांग की रफ्तार को धीमा कर सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम एशिया संकट के कारण महंगे कच्चे तेल और वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव से पेट्रोल-डीजल, एलपीजी, एफएमसीजी उत्पाद, डेयरी, केमिकल, वाहन और ड्यूरेबल्स सेक्टर की लागत बढ़ रही है।
सब्सिडी का बोझ बढ़ने की आशंका
विशेषज्ञों का मानना है कि महंगाई बढ़ने के साथ सरकार पर खाद्य, उर्वरक और ईंधन सब्सिडी का दबाव भी बढ़ सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, उर्वरक सब्सिडी बिल अगले साल बढ़कर करीब 3.4 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है, जो फिलहाल लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपये है। वहीं खाद्य सब्सिडी बिल वित्त वर्ष 2027 में 2.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।
हालांकि, उर्वरक मंत्रालय की अपर सचिव Aparna S Sharma ने संकेत दिया है कि वैश्विक कीमतों में गिरावट और सरकारी टेंडरों के नतीजों के आधार पर सब्सिडी के अनुमान की दोबारा समीक्षा की जा सकती है।
विदेशी निर्भरता बढ़ा रही चिंता
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की विदेशी निर्भरता केवल कच्चे तेल तक सीमित नहीं है। देश दुर्लभ खनिज, उर्वरक, सेमीकंडक्टर और अहम तकनीकों के लिए भी बड़े पैमाने पर दूसरे देशों पर निर्भर है। ऐसे में वैश्विक तनाव बढ़ने का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
शेयर बाजार और रुपये पर दबाव
ईरान संकट और भू-राजनीतिक अनिश्चितता का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी देखने को मिला है। रिपोर्ट के अनुसार, निफ्टी अपने 52 सप्ताह के उच्चतम स्तर से करीब 15.4 फीसदी नीचे आ चुका है, जबकि दो महीनों में इसमें 7.2 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।
इसके साथ ही विदेशी निवेशकों की बिकवाली, रेमिटेंस पर दबाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के कारण रुपये पर भी दबाव बना हुआ है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यदि महंगाई लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती है, तो 2027 की दूसरी छमाही में रेपो दर बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
हालांकि, इन चुनौतियों के बावजूद रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि फिलहाल भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार मजबूत बनी हुई है, लेकिन आने वाले समय में वैश्विक हालात पर करीबी नजर रखना जरूरी होगा।
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