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नटराज के पैरों तले कौन है अपस्मार? शिव के इस रूप में छिपा है ये रहस्‍य और संदेश

August 08, 2026

नई दिल्ली। भगवान शिव (Lord Shiva) का नटराज (Nataraja) स्वरूप सनातन परंपरा (Sanatan Tradition) के सबसे गूढ़ और प्रतीकात्मक रूपों में से एक माना जाता है। नृत्य के अधिपति के रूप में शिव की यह प्रतिमा केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सृष्टि, ऊर्जा, समय, ज्ञान और चेतना से जुड़े गहरे संदेशों को भी दर्शाती है। नटराज की प्रतिमा (Statue of Nataraja) में मौजूद हर प्रतीक का अपना विशेष अर्थ है।

शिव के नटराज रूप को ब्रह्मांड की निरंतर गति और सृष्टि के चक्र का प्रतीक माना जाता है। इसमें उत्पत्ति, स्थिति और संहार यानी निर्माण, संरक्षण और विनाश के चक्र को दर्शाया गया है। इसी वजह से नटराज की प्रतिमा को ब्रह्मांडीय ऊर्जा के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। आधुनिक विज्ञान और भौतिकी में ब्रह्मांड की निरंतर गति की अवधारणा से इसे जोड़ा जाता है। स्विट्जरलैंड के जिनेवा स्थित CERN संस्थान के परिसर में स्थापित नटराज की विशाल प्रतिमा भी इस प्रतीकात्मक संबंध का चर्चित उदाहरण है।

पैरों के नीचे दबा अपस्मार क्या दर्शाता है?
नटराज की प्रतिमा का सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक उनके पैरों के नीचे दिखाई देने वाली बौनी आकृति है। इसे अपस्मार या मुइलका कहा जाता है। हिंदू पौराणिक परंपरा में अपस्मार को अज्ञान, अहंकार, मूर्खता और मानसिक जड़ता का प्रतीक माना गया है।


  • भगवान शिव का अपस्मार को अपने पैर के नीचे दबाए रखना इस बात का प्रतीक है कि ज्ञान और चेतना को अज्ञान तथा अहंकार पर नियंत्रण रखना चाहिए। आध्यात्मिक दृष्टि से इसका संदेश है कि मनुष्य जब तक अपने भीतर मौजूद अज्ञान और अहंकार पर विजय नहीं पाता, तब तक सच्चे ज्ञान और आत्मबोध की दिशा में आगे बढ़ना कठिन है।

    यह प्रतीक जीवन में संतुलन का संदेश भी देता है। बाहरी उपलब्धियों की दौड़ के बीच व्यक्ति के लिए जरूरी है कि वह विवेक, ज्ञान और चेतना को प्राथमिकता दे।

    आग का घेरा बताता है समय और सृष्टि का चक्र
    नटराज के चारों ओर बना प्रभामंडल या अग्नि का घेरा सृष्टि के भौतिक चक्र, समय की निरंतर गति और जन्म-मृत्यु के चक्र का प्रतीक माना जाता है। यह बताता है कि ब्रह्मांड में परिवर्तन लगातार जारी रहता है और कुछ भी स्थायी नहीं है।

    डमरू में छिपा सृष्टि का नाद
    नटराज के दाहिने ऊपरी हाथ में डमरू दिखाई देता है। इसे सृष्टि की पहली ध्वनि, नाद या ब्रह्मांडीय स्पंदन का प्रतीक माना जाता है। डमरू सृष्टि की शुरुआत और समय के आरंभ की ओर संकेत करता है।

    हाथ में अग्नि विनाश का प्रतीक
    शिव के बाएं ऊपरी हाथ में अग्नि है। यह सृष्टि के अंत और प्रलय का प्रतीक मानी जाती है। जिस प्रकार सृष्टि की शुरुआत होती है, उसी तरह एक समय उसका समापन भी होता है। नटराज की मुद्रा इसी निरंतर चक्र को दर्शाती है।

    अभय मुद्रा देती है निर्भय रहने का संदेश
    नटराज की प्रतिमा में शिव का एक हाथ अभय मुद्रा में उठा हुआ है। इसका अर्थ भय से मुक्त रहने और सुरक्षा का आश्वासन माना जाता है। इसका आध्यात्मिक संदेश है कि धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है।

    इस तरह नटराज का स्वरूप केवल शिव के तांडव नृत्य का चित्रण नहीं है। इसमें सृष्टि की गति, समय का चक्र, ऊर्जा, विनाश, ज्ञान और अज्ञान के बीच संघर्ष जैसे कई दार्शनिक संदेश एक साथ समाहित हैं। पैरों के नीचे दबा अपस्मार विशेष रूप से यह संदेश देता है कि ज्ञान और चेतना की रोशनी में अज्ञान तथा अहंकार को नियंत्रित करना ही आत्मबोध की दिशा में पहला कदम है।

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