नई दिल्ली। अगले साल की शुरुआत में होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए कई मोर्चों पर चुनौतीपूर्ण रहने वाले हैं। पार्टी के सामने चार राज्यों में अपनी सरकार बचाए रखने की चुनौती है। इसी को देखते हुए भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व संगठन को मजबूत करने के साथ लगातार जमीनी फीडबैक जुटा रहा है।
पार्टी के आकलन में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की स्थिति मणिपुर और गोवा के मुकाबले बेहतर मानी जा रही है, लेकिन यहां भी पिछली बार की तरह चुनाव आसान नहीं रहने के संकेत मिल रहे हैं। वहीं मणिपुर से मिलने वाला फीडबैक भाजपा की चिंता बढ़ा रहा है।
भाजपा की नई केंद्रीय संगठनात्मक टीम ने कामकाज शुरू कर दिया है। उत्तर प्रदेश के लिए संगठन प्रभारी भी तय किए जा चुके हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय नेतृत्व को मिल रहे फीडबैक में संकेत है कि यूपी और उत्तराखंड में लगातार दो कार्यकाल पूरे कर चुकी भाजपा सरकारों को इस बार पहले की तुलना में ज्यादा चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
इसी वजह से पार्टी दोनों राज्यों में संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने और जमीनी सक्रियता बढ़ाने पर जोर दे रही है।
यूपी-उत्तराखंड में सत्ता विरोधी माहौल की चिंता
उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की कोशिश करेगी। पार्टी के सामने विपक्षी दलों की चुनौती के साथ करीब एक दशक की सत्ता के बाद संभावित सत्ताविरोधी माहौल भी बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
हालांकि भाजपा को मिल रहे फीडबैक में अभी भी दोनों राज्यों में सत्ता बरकरार रखने की संभावना मजबूत मानी जा रही है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि समय रहते संगठनात्मक स्तर पर कमियों को दूर कर चुनावी स्थिति को मजबूत किया जा सकता है।
गोवा में स्थानीय समीकरण अहम
गोवा में भाजपा के लिए सरकार के कामकाज के अलावा नेताओं की व्यक्तिगत लोकप्रियता और स्थानीय राजनीतिक समीकरण भी काफी मायने रखते हैं। राज्य में विपक्ष को लेकर भाजपा को बहुत बड़ी चुनौती दिखाई नहीं दे रही, लेकिन पार्टी अपने समर्थक वर्ग के रुख को लेकर सतर्क है।
छोटे राज्यों में स्थानीय मुद्दे और उम्मीदवारों की छवि अक्सर चुनावी नतीजों पर बड़ा असर डालती है। इसलिए भाजपा यहां भी संगठन और समर्थकों के बीच संपर्क बढ़ाने पर ध्यान दे रही है।
मणिपुर ने बढ़ाई भाजपा की चिंता
इन सभी राज्यों में सबसे ज्यादा चिंता मणिपुर को लेकर सामने आ रही है। पार्टी को मिल रहे फीडबैक के मुताबिक, राज्य में पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रम के कारण राजनीतिक स्थिति का आकलन करना आसान नहीं है।
भाजपा के समर्थन वाले कुछ जातीय समूहों में नाराजगी की बात सामने आई है। हालांकि नेतृत्व परिवर्तन के बाद हालात में कुछ सुधार होने का दावा किया जा रहा है, लेकिन पार्टी इस नाराजगी को नजरअंदाज करने के मूड में नहीं है।
पंजाब में बढ़ सकती है भाजपा की ताकत
पंजाब में भाजपा के पास फिलहाल सत्ता नहीं है, लेकिन पार्टी को आने वाले चुनाव में अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ने की उम्मीद है। इसी रणनीति के तहत संगठन को जमीनी स्तर पर सक्रिय करने और नए सामाजिक समूहों तक पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
कुल मिलाकर, पांच राज्यों के चुनाव भाजपा के लिए केवल सरकार बचाने की कवायद नहीं हैं। यूपी और उत्तराखंड में हैट्रिक, मणिपुर में नाराजगी दूर करना, गोवा में स्थानीय समीकरण साधना और पंजाब में विस्तार—इन सभी मोर्चों पर पार्टी को एक साथ काम करना होगा।
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