नई दिल्ली। शादी को लेकर हर धर्म की अपनी परंपराएं हैं-कहीं सात फेरे, कहीं निकाह, तो कहीं चर्च या गुरुद्वारे में विवाह (Marriage in Buddhism)। लेकिन बौद्ध धर्म (Marriage in Buddhism) में शादी का तरीका इन सबसे काफी अलग और बेहद सरल होता है। यहां विवाह को धार्मिक संस्कार नहीं, बल्कि एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में देखा जाता है।
गौतम बुद्ध की शिक्षाओं के अनुसार, विवाह का उद्देश्य जीवन में जिम्मेदारी, प्रेम और आपसी सम्मान को बढ़ाना है। यही वजह है कि बौद्ध विवाह में
बौद्ध समाज में सगाई अनिवार्य नहीं होती। यदि परिवार सहमत हों, तो सीधे शादी की तारीख तय कर ली जाती है।
विवाह के दौरान सभी लोग बुद्ध की प्रतिमा की ओर मुख करके बैठते हैं और भिक्षु के मार्गदर्शन में मंत्रों का जाप करते हैं, जैसे—
इसके बाद वर-वधू दीप जलाते हैं, अगरबत्ती लगाते हैं और बुद्ध को पुष्प अर्पित करते हैं।
बौद्ध विवाह में सबसे अहम हिस्सा होता है—वचन (प्रतिज्ञाएं)।
यह प्रक्रिया किसी धार्मिक बंधन से ज्यादा आपसी समझ और कर्तव्य पर आधारित होती है।
भिक्षु “मंगल सुत्त” या “जयमंगल गाथा” का पाठ कर आशीर्वाद देते हैं।
बौद्ध विवाह आमतौर पर 30 मिनट से 1 घंटे के भीतर पूरा हो जाता है। इसके बाद
बौद्ध परंपरा में
कुल मिलाकर, बौद्ध धर्म में शादी दिखावे से दूर, सादगी और जिम्मेदारी पर आधारित होती है—जहां रिश्ते की नींव रस्मों से नहीं, बल्कि आपसी सम्मान और समझ से रखी जाती है।
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