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30 साल की लीज और आवंटन के 32 साल बाद भवन निर्माण…भंडारी मिल प्रसूति गृह भू-घोटाले में दस्तावेजों की अब गहन छानबीन शुरू

June 04, 2026

  • अग्निबाण भंडाफोड़ (पार्ट-4)… निगम से चल रहे निर्माण कार्य को रुकवाने के बाद प्राधिकरण सीईओ ने भू-अर्जन, विधि और सम्पदा शाखा की फाइलें ढुंढवाईं, होगी प्रभावी कार्रवाई

इंदौर। एक तरफ अग्निबाण भंडारी मिल प्रसूति गृह भू-घोटाले का तथ्यात्मक प्रकाशन किया, तो दूसरी तरफ अधिकारियों को कई महत्वपूर्ण दस्तावेज भी उपलब्ध करवाए, जिसके चलते प्राधिकरण सीईओ ने सम्पदा, विधि और भू-अर्जन शाखा की फाइलों को ढुंढवाने के साथ सुप्रीम कोर्ट, शासन आदेशों के साथ व्ययन शर्तों के उल्लंघन के मामले में पड़ताल शुरू करवाई। इस पूरे मामले में अचरज भरी बात यह है कि प्राधिकरण द्वारा जो टेंडर जारी किया गया था, उसमें 30 वर्ष की लीज का प्रावधान था, भंडारी मिल प्रसूती गृह का यह प्लाट वर्ष 1994 में आवंटित किया गया और आवंटन के आधार पर उक्त भूखंड की लीज अवधि वर्ष 2024 में ही समाप्त हो चुकी है, लेकिन दस्तावेजी गोलमाल के चलते लीज की अवधि बढ़ा दी गई और 32 साल बाद निर्माण कार्य शुरू किया गया। अब प्राधिकरण के सीईओ द्वारा प्रसूती गृह भूघोटाले में दस्तावेजों की गहन छानबीन कर लीज पंजीयन की भी जांच की जा रही है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भी खंगाला जा रहा है, जिसमें उक्त भूखंड पर केवल भंडारी मिल प्रसूती गृह ही बनाने के आदेश दिए गए थे।

दरअसल यह भूखंड भंडारी मिल के कर्मचारियों और शहर में प्रसूति गृह की सुविधा के लिए नंदलाल भंडारी मिल्स के मालिकों द्वारा संरक्षित कर यहां पर प्रसूति गृह बनाया गया था और जब भंडारी मिल की जमीन का निस्तारण हुआ तब यह मसला उठा और मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया, जहां इंदौर विकास प्राधिकरण को इस शर्त पर उक्त भूखंड खरीदने की अनुमति दी गई कि यहां पर भंडारी मिल प्रसूति गृह ही खुलेगा, लेकिन प्राधिकरण ने उक्त भूखंड पर जब आवासीय प्लाट भी स्थापित कर दिए, तब शहर के एक वकील सहित एक उद्योगपति ने लिखित शिकायत कर यहां भंडारी प्रसूति गृह ही खोले जाने की बात की, लेकिन तात्कालिक संचालकों ने उसे नंजरंदाज कर दिया। आश्चर्य की बात तो यह है कि उक्त भूखंड प्राधिकरण द्वारा एक करोड़ की कीमत में खरीदा गया और इतनी ही कीमत में बेच दिया गया।


  • इसके बाद इस भूखंड को लेकर कई कारगुजारियां की जाती रही। भूखंड का आवंटन वर्ष 1994 में हुआ और जिस बिल्डर ने सर्वाधिक कीमत लगाई, उसे आवंटित न करते हुए भूखंड के दूसरे खरीदार पचोरवाला बिल्डर को भूखंड आवंटित कर दिया गया, जबकि नियमानुसार उक्त भूखंड का दूसरी बार टेंडर होना था। जिस वक्त पर टेंडर किया गया, उस वक्त से ही प्राधिकरण के पास उक्त भूखंड का कब्जा था, लेकिन पचोरवाला बिल्डर ने भूखंड की राशि लीज नियमों का उल्लंघन करते हुए 13 वर्षों तक यानी 2007 तक चुकाई और पूर्ण भुगतान प्राप्त होने पर कब्जे का दावा किया। प्राधिकरण की लीज नियमों के अनुसार लीज आवंटन के 4 वर्षों में ही पंजीयन हो जाना चाहिए था, लेकिन 23 साल बाद उक्त भूखंड का पंजीयन 2017 में कराया गया, जिसमें लीज अवधि 1994 से 2024 के बजाए 2007 से 2037 लीख दी गई। इसके बावजूद बिल्डर ने भवन निर्माण नहीं किया और लीज अवधि के 19 साल बाद निर्माण शुरू करने के प्रयास किए।

    लीज नियमों के अनुसार उसे लीज के चार वर्ष में ही निर्माण कार्य पूर्ण कर देना चाहिए था और नहीं करने पर अनापत्ति प्राप्त करना थी, लेकिन पचोरवाला बिल्डर ने इसलिए अनापत्ति नहीं ली, क्योंकि यदि वह एनओसी की मांग करता तो नए व्ययन नियम के अनुसार 10 वर्षों में निर्माण कार्य नहीं होने पर प्राधिकरण भूखंड वापस ले लेता। दस्तावेजी कारगुजारियां छुपाने के लिए बिना अनुमति नक्शा पास करा लिया, जब्िक नक्शा पास करने वाले निगम अधिकारी को लीज डीड की शर्तों की जांच करना थी, क्योंकि भूखंड का असली मालिक तो इंदौर विकास प्राधिकरण है, पचोरवाला बिल्डर तो मात्र लीज गृहिता यानी किराएदार है। इन सभी कारगुजारियों की जानकारी दस्तावेजी प्रमाणों सहित प्राधिकरण को प्राप्त होने के बाद सीईओ परीक्षित झाड़े ने तत्काल संज्ञान लेते हुए निगम को पत्र लिखकर निर्माण कार्य रोकने की बात लिखी, जिस पर निगमायुक्त क्षितिज सिंघल ने भवन अधिकारी को तत्काल कार्रवाई करने के निर्देश दिए। अब सीईओ ने इन सभी दस्तावेजों को ढूंढने के साथ सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को भी निकलवाया है। दरअसल, इस भूखंड के मामले में सुप्रीम कोर्ट के भी लगभग तीन आदेशों की जानकारी सामने आई है और इसका स्पष्ट हवाला प्राधिकरण की ही फाइलों और नोटशीटों में मिलता है। इतना ही नहीं, मध्यप्रदेश शासन के भी स्पष्ट आदेश इन दस्तावेजों में हैं, जिसमें साफ कहा गया कि उक्त जमीन यानी भूखंड पर सिर्फ मेटरनिटी होम ही निर्मित किया जा सकता है। अन्य कोई उपयोग मंजूर नहीं करेगा। प्राधिकरण का भी कहना है कि सुप्रीम कोर्ट और शासन आदेशों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि मौके पर ली गई भवन अनुज्ञा पूरी तरह से अवैध है और अब प्राधिकरण भी इन दस्तावेजी जांच और व्ययन नियमों के उल्लंघन के साथ इस मामले में बड़ा निर्णय लेगा।

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