कराची। पाकिस्तान (Pakistan) में खैबर पख्तूनख्वा (Khyber Pakhtunkhwa) के बिगड़ते प्रशासनिक और सुरक्षा हालात के बीच राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इसी सिलसिले में गृह मंत्री मोहसिन नकवी (Khyber Pakhtunkhwa) ने कराची स्थित बिलावल हाउस (Bilawal House) में राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी (Asif Ali Zardari) से मुलाकात की। बैठक बंद कमरे में हुई और इसे सामान्य शिष्टाचार भेंट के बजाय खैबर पख्तूनख्वा की स्थिति पर महत्वपूर्ण विचार-विमर्श के तौर पर देखा जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार बैठक में प्रांत की कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक स्थिति, सीमा से लगे इलाकों में केंद्र की कमजोर होती पकड़ और हालात सुधारने के संभावित उपायों पर चर्चा हुई। इसके अलावा संवैधानिक प्रावधानों के तहत केंद्र के हस्तक्षेप की संभावनाओं पर भी विचार किए जाने की बात सामने आई है।
खैबर पख्तूनख्वा पर क्यों बढ़ा दबाव
अफगानिस्तान से सटे खैबर पख्तूनख्वा में सुरक्षा चुनौतियां लंबे समय से पाकिस्तान के लिए चिंता का विषय रही हैं। केंद्र और प्रांतीय प्रशासन के बीच समन्वय को लेकर भी मतभेद सामने आते रहे हैं। पेशावर में केंद्र और प्रांतीय अधिकारियों के बीच कथित टकराव के कारण आतंकवाद निरोधक अभियानों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में तालमेल प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
केंद्र की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि यदि किसी प्रांत में संवैधानिक मशीनरी प्रभावी ढंग से काम करने में विफल रहती है और कानून-व्यवस्था लगातार बिगड़ती है, तो संविधान के तहत केंद्र के हस्तक्षेप का रास्ता खुल सकता है। इसी संदर्भ में अनुच्छेद 232 और 234 चर्चा में हैं।
क्या कहते हैं अनुच्छेद 232 और 234
पाकिस्तान के संविधान का अनुच्छेद 232 आपातकालीन स्थिति से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 234 किसी प्रांत में संवैधानिक व्यवस्था के विफल होने की स्थिति में राष्ट्रपति की ओर से कदम उठाने का प्रावधान करता है। ऐसी स्थिति में प्रांतीय शासन की व्यवस्था में बदलाव किया जा सकता है और राज्यपाल के माध्यम से प्रशासन चलाने का रास्ता खुल सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, कराची में हुई बैठक में इन्हीं संवैधानिक विकल्पों के कानूनी पहलुओं पर चर्चा की गई। केंद्र के स्तर पर यह भी आकलन किया जा रहा है कि प्रशासनिक असहयोग और लगातार सामने आ रही सुरक्षा चुनौतियां संवैधानिक हस्तक्षेप के लिए पर्याप्त आधार बनती हैं या नहीं। हालांकि, अभी तक इस संबंध में कोई अंतिम निर्णय या आदेश जारी नहीं हुआ है।
सीमाई इलाकों में केंद्र की पकड़ पर चर्चा
न्यूज 18 की रिपोर्ट के मुताबिक, बैठक में कानून-व्यवस्था की स्थिति को सुधारने पर विशेष जोर दिया गया। अस्थिर सीमाई इलाकों में प्रशासन, पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत पर चर्चा हुई। केंद्र की चिंता केवल पेशावर तक सीमित नहीं है, बल्कि अफगानिस्तान से लगे संवेदनशील क्षेत्रों में प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत करने को भी अहम माना जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, यदि प्रांतीय सरकार की ओर से पर्याप्त सहयोग नहीं मिलता है तो केंद्र संवैधानिक प्रावधानों के तहत आगे बढ़ने के विकल्प पर विचार कर सकता है। इसी वजह से राज्यपाल शासन की संभावना को भी पूरी तरह खारिज नहीं किया गया है।
नए प्रांत या प्रशासनिक इकाइयों का प्रस्ताव
बैठक में मौजूदा संकट से निपटने के साथ-साथ लंबे समय के प्रशासनिक बदलावों पर भी चर्चा होने की बात सामने आई है। सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि विवादित और रणनीतिक रूप से संवेदनशील इलाकों में बेहतर प्रशासन के लिए नए प्रांत या नई प्रशासनिक इकाइयां बनाने का प्रस्ताव भी विचाराधीन है।
इसके समर्थकों का तर्क है कि प्रशासनिक सीमाओं में बदलाव से कुछ इलाकों में शासन और सुरक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाया जा सकता है। हालांकि, ऐसे किसी भी बदलाव के लिए संवैधानिक संशोधन और राजनीतिक दलों की सहमति आवश्यक होगी।
कैबिनेट बैठक के बाद हो सकता है अंतिम फैसला
खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल लगाने या प्रशासनिक व्यवस्था में बड़े बदलाव का अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के इस्लामाबाद लौटने के बाद संघीय कैबिनेट और शीर्ष स्तर की बैठकों में इस मुद्दे पर चर्चा होने की संभावना है।
इन बैठकों में राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी, सरकार के वरिष्ठ नेता और सुरक्षा प्रतिष्ठान के शीर्ष अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं। इसके बाद ही यह तय होगा कि खैबर पख्तूनख्वा की मौजूदा स्थिति से निपटने के लिए सरकार कौन-सा संवैधानिक और प्रशासनिक रास्ता अपनाती है।
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