नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान (The United States and Iran) के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा बाजार (Global energy market) की चिंता बढ़ा दी है। पश्चिम एशिया में हालात बिगड़ने के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तनाव लंबा खिंचता है और होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल आपूर्ति प्रभावित होती है, तो वैश्विक बाजार में कीमतों पर और दबाव बढ़ सकता है।
कच्चे तेल में तेज उछाल
बाजार में कारोबारी गतिविधियों के दौरान ब्रेंट क्रूड की कीमत में 5 प्रतिशत से अधिक की तेजी दर्ज की गई, जबकि WTI क्रूड और मर्बन क्रूड भी मजबूत बढ़त के साथ कारोबार करते दिखे। निवेशकों की चिंता का मुख्य कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक जोखिम और तेल आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता है।
विश्लेषकों का कहना है कि किसी भी बड़े सैन्य टकराव का सीधा असर ऊर्जा बाजार पर पड़ता है, क्योंकि इस क्षेत्र से दुनिया को बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की आपूर्ति होती है।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। यदि यहां जहाजों की आवाजाही बाधित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति घटने की आशंका बढ़ जाती है, जिससे कीमतों में तेजी आ सकती है।
इसी वजह से इस क्षेत्र में बढ़ने वाला हर सैन्य तनाव तेल बाजार पर तत्काल असर डालता है।
क्या 120 डॉलर तक पहुंच सकता है तेल?
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि 120 डॉलर प्रति बैरल का स्तर केवल एक संभावित परिदृश्य है, कोई निश्चित अनुमान नहीं। यदि संघर्ष लंबा चलता है, तेल आपूर्ति गंभीर रूप से बाधित होती है और होर्मुज जलडमरूमध्य में लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है, तभी कीमतें इस स्तर तक पहुंच सकती हैं।
हालांकि यदि तनाव कम होता है और आपूर्ति सामान्य बनी रहती है, तो कीमतों में फिर नरमी भी आ सकती है। इसलिए फिलहाल 120 डॉलर का आंकड़ा संभावित जोखिम के रूप में देखा जा रहा है, न कि तय भविष्यवाणी के रूप में।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो इसका असर इन क्षेत्रों पर पड़ सकता है—
पेट्रोल और डीजल की लागत बढ़ने की संभावना।
परिवहन महंगा होने से वस्तुओं की कीमतों पर दबाव।
एलपीजी और अन्य ईंधनों की लागत में वृद्धि की आशंका।
महंगाई दर पर अतिरिक्त दबाव।
हालांकि भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें केवल कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करतीं। इनमें टैक्स, रिफाइनिंग लागत, परिवहन खर्च, विनिमय दर और सरकारी नीतियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
फिलहाल बाजार की नजर घटनाक्रम पर
ऊर्जा बाजार के जानकारों का कहना है कि आने वाले दिनों में अमेरिका-ईरान तनाव, होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति और ओपेक+ देशों की रणनीति पर बाजार की नजर रहेगी। यदि हालात सामान्य होते हैं तो कीमतों में स्थिरता लौट सकती है, लेकिन संघर्ष बढ़ने की स्थिति में वैश्विक महंगाई और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता और गहरा सकती है।
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