
नई दिल्ली । वरिष्ठ कांग्रेस नेत्री सोनिया गांधी (Senior Congress leader Sonia Gandhi) ने कहा कि मौजूदा नीति (Current Policy) से भारत की कूटनीतिक साख पर (On India’s Diplomatic Credibility) विपरित असर पड़ रहा है (Is having an Adverse Impact) ।
कांग्रेस संसदीय दल (सीपीपी) की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि गाजा मुद्दे पर केंद्र सरकार की ‘चुप्पी’ और ‘निष्क्रियता’ न सिर्फ नैतिक रूप से गलत है, बल्कि भारत के राष्ट्रीय हितों के भी खिलाफ है। सोनिया गांधी ने कहा कि भारत की मौजूदा नीति ने देश को उसकी लंबे समय से चली आ रही विदेश नीति की परंपराओं और ऐतिहासिक सहयोगियों से दूर कर दिया है। भारत फिलिस्तीन, ईरान और पूरे पश्चिम एशिया से दूरी बना चुका है, जबकि पाकिस्तान खुद को इस क्षेत्र में मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने लिखा कि भारतीय राष्ट्र की भावना यह मांग करती है कि भारत फिलिस्तीनी लोगों के पक्ष में आवाज उठाए, जिनके बच्चों को बेरहमी से निशाना बनाया गया है। साथ ही, राष्ट्रीय हित भी यही कहते हैं कि भारत गाजा में इजरायल की ‘नरसंहार जैसी कार्रवाई’ और वेस्ट बैंक में लाखों फिलिस्तीनी परिवारों के विस्थापन के खिलाफ वैश्विक जनमत का समर्थन करे। केंद्र सरकार की लगातार चुप्पी को न नैतिक रूप से और न ही तर्कसंगत तरीके से सही ठहराया जा सकता है।
सोनिया गांधी ने संयुक्त राष्ट्र की स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि सितंबर 2025 में आयोग ने निष्कर्ष निकाला था कि गाजा में इजरायली प्रशासन फिलिस्तीनियों के खिलाफ नरसंहार कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि जून 2026 में न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) एस. मुरलीधर की अध्यक्षता वाले आयोग ने भी दोहराया कि इजरायल की कार्रवाई का उद्देश्य गाजा में फिलिस्तीनियों के अस्तित्व को खत्म करना है और इसमें बच्चों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया। उन्होंने आयोग की 94 पन्नों की रिपोर्ट को बेहद दर्दनाक बताते हुए कहा कि इसमें गाजा में हुई तबाही का विस्तार से जिक्र है। उनके अनुसार, अब तक कम से कम 20 हजार बच्चों की मौत हो चुकी है और 44 हजार से अधिक बच्चे घायल हुए हैं, जिनमें से कई जिंदगी भर के लिए विकलांग हो गए हैं। उन्होंने दावा किया कि अस्पतालों, खासकर बच्चों के अस्पतालों को नुकसान पहुंचाने की वजह से गर्भपात और प्रसव संबंधी जटिलताओं में 300 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है।
सोनिया गांधी ने 7 अक्टूबर को हमास द्वारा इजरायल पर किए गए हमले को ‘भयावह और पूरी तरह अस्वीकार्य’ बताया, लेकिन कहा कि इसके बाद पिछले ढाई वर्षों में इजरायल की सैन्य कार्रवाई अत्यधिक क्रूर और अमानवीय रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि इजरायल के शीर्ष नेताओं ने गाजा की ‘पूर्ण घेराबंदी’ और ‘पूरी तरह खत्म करने’ जैसी बातें कही हैं तथा फिलिस्तीनियों के अस्तित्व के अधिकार तक को नकारा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के समर्थन ने इजरायल को अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखने का अवसर दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि अमेरिका के रुख के कारण संयुक्त राष्ट्र भी प्रभावी कदम नहीं उठा सका, जबकि उसकी एजेंसियां कथित युद्ध अपराधों का दस्तावेजीकरण करती रही हैं।
कांग्रेस नेता ने कहा कि फ्रांस, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई पश्चिमी देशों ने फिलिस्तीन को मान्यता दी है। वहीं दक्षिण अफ्रीका ने इजरायल के खिलाफ 1948 के नरसंहार कन्वेंशन के उल्लंघन का मामला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) में दायर किया है। उन्होंने कहा कि कई यूरोपीय देशों ने इजरायल को हथियारों के निर्यात पर रोक लगाई है और कई लैटिन अमेरिकी देशों ने उससे अपने राजनयिक संबंध सीमित या समाप्त कर दिए हैं। कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (आईसीसी) ने इजरायली नेतृत्व के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए हैं।
सोनिया गांधी ने कहा कि भारत लंबे समय तक उपनिवेशवाद विरोध, राष्ट्रीय संप्रभुता और वैश्विक शांति का समर्थक रहा है, लेकिन आज वही भारत गाजा और वेस्ट बैंक में मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चुप है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत ऐसे समय में इजरायल के और करीब जा रहा है, जब दुनिया का बड़ा हिस्सा उससे दूरी बना रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री की इजरायल यात्रा को भी ‘हैरान करने वाला रणनीतिक फैसला’ बताया। उनके मुताबिक, भारत ने फिलिस्तीन, ईरान और अपने पुराने सहयोगियों से दूरी बना ली है और इससे पाकिस्तान को मध्यस्थ की भूमिका निभाने का मौका मिल गया है। अपने लेख के अंत में सोनिया गांधी ने कहा कि भारत की पारंपरिक विदेश नीति से इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभ केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की व्यक्तिगत मित्रता तक सीमित दिखाई देता है, जबकि इससे भारत की वैश्विक नैतिक और कूटनीतिक साख को नुकसान पहुंचा है।
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