
नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के एवरग्रीन सुपरस्टार(the evergreen superstar) देव आनंद(Dev Anand) सिर्फ अपनी फिल्मों और रोमांटिक अंदाज(romantic persona) के लिए नहीं, बल्कि अपने बेबाक विचारों और साहसी फैसलों(views and courageous decisions) के लिए भी जाने जाते थे। 1970 के दशक में जब देश में इमरजेंसी(the Emergency) का दौर था, तब देव आनंद(Dev Anand) उन चुनिंदा फिल्मी हस्तियों में शामिल थे जिन्होंने सत्ता के सामने झुकने से इनकार कर दिया और अपने सिद्धांतों (their principles)पर कायम रहे।
1975 से 1977 तक चले इमरजेंसी के दौरान देश में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर कई पाबंदियां लागू थीं। इसी दौरान देव आनंद ने सरकारी प्रचार से जुड़े कार्यक्रमों में हिस्सा लेने से इनकार किया, जिससे वह उस समय चर्चा में आ गए। रिपोर्ट्स के अनुसार, उनका मानना था कि कलाकारों को अपनी स्वतंत्र राय रखने का अधिकार होना चाहिए।
इमरजेंसी के बाद देव आनंद ने कुछ फिल्मी हस्तियों के साथ मिलकर एक राजनीतिक मंच बनाने की कोशिश की थी। उन्होंने “नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया” नाम से एक राजनीतिक दल बनाने की पहल भी की, लेकिन संगठनात्मक तैयारी और चुनावी रणनीति की कमी के कारण यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी।
हालांकि इस बात के ठोस प्रमाण नहीं हैं कि सरकार ने उनकी फिल्मों पर आधिकारिक रूप से बैन लगाया था, लेकिन उस दौर में यह चर्चा जरूर रही कि कुछ कलाकारों और उनकी फिल्मों को अप्रत्यक्ष रूप से मुश्किलों का सामना करना पड़ा। कई फिल्मों को सेंसर प्रक्रिया और रिलीज में देरी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा था।
देव आनंद ने कई इंटरव्यू और बयानों में इमरजेंसी को लोकतंत्र के लिए कठिन समय बताया था। उन्होंने इसे ऐसा दौर कहा था जिसमें आम लोगों और कलाकारों की स्वतंत्रता पर दबाव महसूस किया गया।
फिल्मी दुनिया में देव आनंद का योगदान बेहद बड़ा रहा है। उन्होंने ‘गाइड’, ‘सीआईडी’, ‘ज्वेल थीफ’, ‘टैक्सी ड्राइवर’, ‘जाल’, ‘कालाबाजार’ और ‘हरे राम हरे कृष्णा’ जैसी कई यादगार फिल्में दीं। 1971 में आई ‘हरे राम हरे कृष्णा’ उन्होंने खुद डायरेक्ट भी की थी, जिसने युवाओं पर गहरा असर डाला।
फिल्ममेकर शेखर कपूर समेत कई लोगों ने देव आनंद को एक ऐसे कलाकार के रूप में याद किया है जो सिर्फ स्टार नहीं थे, बल्कि अपने विचारों के लिए खड़े रहने वाले इंसान थे।
देव आनंद का जीवन सिर्फ सिनेमा तक सीमित नहीं था, बल्कि वह उस दौर की सामाजिक और राजनीतिक सोच का भी हिस्सा थे। 2011 में उनके निधन के बाद भी उनकी फिल्में और उनका व्यक्तित्व भारतीय सिनेमा में एक प्रेरणा की तरह जीवित है।
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