नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने उत्तर प्रदेश से आगामी राज्यसभा चुनाव (Rajya Sabha Elections) के लिए आठ नए उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं। पार्टी ने इस बार उत्तर प्रदेश से अपने किसी भी मौजूदा राज्यसभा सदस्य (Rajya Sabha Member) को दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया है। इनमें केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी और केंद्रीय राज्य मंत्री बीएल वर्मा भी शामिल हैं। पुरी का मौजूदा राज्यसभा कार्यकाल नवंबर 2026 में समाप्त हो रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर वह सांसद नहीं रहते हैं तो क्या केंद्रीय मंत्री के पद पर बने रह सकते हैं?
हरदीप सिंह पुरी उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सदस्य हैं। उनका मौजूदा कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को समाप्त होना है। भाजपा ने उत्तर प्रदेश की जिन आठ सीटों के लिए उम्मीदवार घोषित किए हैं, उनमें पुरी का नाम नहीं है। पार्टी ने धारमपाल सिंह, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार को उम्मीदवार बनाया है। उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए मतदान 16 अक्टूबर को होना है।
हालांकि, उम्मीदवारों की सूची में नाम नहीं होने से पुरी की मौजूदा राज्यसभा सदस्यता तत्काल समाप्त नहीं होती। उनका वर्तमान कार्यकाल निर्धारित अवधि तक जारी रहेगा।
संविधान में ऐसी स्थिति के लिए स्पष्ट प्रावधान है। अनुच्छेद 75(5) के अनुसार, कोई व्यक्ति मंत्री है लेकिन लगातार छह महीने की अवधि तक संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं रहता है, तो छह महीने की अवधि समाप्त होते ही वह मंत्री पद पर नहीं रह सकता। यानी मंत्री बनने के लिए व्यक्ति का नियुक्ति के समय लोकसभा या राज्यसभा सांसद होना अनिवार्य नहीं है, लेकिन मंत्री बनने के बाद छह महीने के भीतर संसद के किसी सदन का सदस्य बनना जरूरी है।
इसे आसान भाषा में ऐसे समझा जा सकता है कि यदि कोई मंत्री सांसद नहीं है, तो उसे संसद की सदस्यता हासिल करने के लिए अधिकतम छह महीने की संवैधानिक अवधि मिलती है। इस अवधि में सदस्य नहीं बनने पर मंत्री पद समाप्त हो जाता है।
यदि हरदीप सिंह पुरी का राज्यसभा कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त हो जाता है और उसके बाद वह संसद के किसी भी सदन के सदस्य नहीं रहते, तो उनकी मंत्री पद की स्थिति उसी दिन स्वत: समाप्त नहीं होगी। संविधान के अनुच्छेद 75(5) के तहत छह महीने की लगातार अवधि महत्वपूर्ण होगी।
इस दौरान उन्हें किसी भी संसदीय सदन की सदस्यता हासिल करनी होगी। यदि वह निर्धारित छह महीने के भीतर संसद के सदस्य बन जाते हैं, तो संवैधानिक शर्त पूरी हो जाएगी। यदि ऐसा नहीं होता है, तो छह महीने की अवधि पूरी होने पर वह मंत्री पद पर बने नहीं रह सकते।
नहीं। संविधान में यह शर्त नहीं है कि गैर-सांसद मंत्री को दोबारा राज्यसभा का सदस्य ही बनना होगा। अनुच्छेद 75(5) में संसद के किसी भी सदन का सदस्य बनने की बात कही गई है। इसलिए संवैधानिक रूप से राज्यसभा के साथ लोकसभा भी एक विकल्प है।
ऐसे में यदि भाजपा भविष्य में उन्हें किसी अन्य राज्य की राज्यसभा सीट के जरिए संसद में भेजती है, तो यह संवैधानिक आवश्यकता पूरी हो सकती है। इसी तरह लोकसभा का सदस्य बनने पर भी यह शर्त पूरी हो जाएगी।
उत्तर प्रदेश की मौजूदा सूची में नाम नहीं होने का अर्थ यह नहीं है कि हरदीप पुरी की संसद में वापसी का रास्ता पूरी तरह बंद हो गया है। किसी अन्य राज्य से राज्यसभा सदस्य बनाए जाने की संभावना संवैधानिक रूप से बनी रहती है। हालांकि, उन्हें किस संसदीय सदन में और किस तरीके से वापस लाया जाएगा, यह राजनीतिक और संगठनात्मक निर्णय होगा।
फिलहाल भाजपा ने उत्तर प्रदेश के लिए अपने उम्मीदवार घोषित किए हैं और पुरी को इस सूची में जगह नहीं मिली है। इसलिए उनकी भविष्य की भूमिका को लेकर अभी पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है। इसी वजह से उनके मंत्री पद और संभावित कैबिनेट फेरबदल को लेकर चर्चाएं तेज हुई हैं।
हरदीप सिंह पुरी का राज्यसभा कार्यकाल 25 नवंबर को खत्म होने के बाद भी वह तत्काल मंत्री पद से बाहर नहीं होंगे। यदि वह उस समय संसद के सदस्य नहीं रहते हैं, तो संविधान के अनुच्छेद 75(5) के तहत उनके पास लगातार छह महीने की अवधि होगी। इस अवधि के भीतर संसद के किसी सदन की सदस्यता हासिल करना आवश्यक होगा।
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