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50 नहीं तो 33 भी चलेगा, मायावती ने किया महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन

April 15, 2026

लखनऊ: बहुजन समाज पार्टी (BSP) की अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण के प्रस्ताव का समर्थन किया है. उन्होंने कहा कि यह कम से कम महिलाओं को उनका उचित प्रतिनिधित्व दिलाने की दिशा में एक शुरुआत है. उन्होंने कहा कि इसमें काफी देरी हुई है, लेकिन देरी के बावजूद BSP इसका स्वागत करती है.

राजधानी लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मायावती ने कहा कि भले ही यह आंकड़ा 50 प्रतिशत से कम है, लेकिन यह महिलाओं को उनका हक दिलाने की दिशा में एक अहम कदम है. उन्होंने कहा, अगर 50 नहीं, तो 33 प्रतिशत ही सही, यह भी एक अच्छी शुरुआत है.

उन्होंने कहा, ‘हमारी पार्टी बसपा पहले भी लगातार महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की मांग करती रही है. लेकिन कोई भी अन्य पार्टी इस पर सहमत नहीं हुई, और न ही अब ऐसा लगता है कि वे सहमत होंगी. हम परम पूज्य बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर को भी धन्यवाद देते हैं कि उन्होंने पुरुषों की तरह महिलाओं को भी समान मताधिकार दिया (सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार)’ उन्होंने कहा कि 2023 में पहली बार पारित कानून को लागू करने में देरी के बावजूद, उनकी पार्टी अभी भी इसका स्वागत करती है, और ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर पड़ी महिलाओं को आरक्षण देने की आवश्यकता व्यक्त करती है.


  • उन्होंने कहा, ‘हालांकि इसमें काफी देरी हुई है, लेकिन देरी के बावजूद हमारी पार्टी इसका स्वागत करती है. अगर वास्तव में शोषित और हाशिए पर पड़ी महिलाओं, विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान किया जाता है, जो सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से लगातार हाशिए पर धकेली जा रही हैं, तो यह उचित और ऐतिहासिक दोनों होगा’.

    उन्होंने महिला सशक्तिकरण पर केवल बयानबाजी होने का आरोप लगाते हुए कहा कि ठोस नीति और मजबूत इच्छाशक्ति की कमी के कारण महिलाओं को उनका अधिकार नहीं मिल पाया है.साथ ही उन्होंने महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों और हिंसा पर भी चिंता जताई.

    उन्होंने महिलाओं के लिए आरक्षण में ऐतिहासिक रूप से देरी करने के लिए कांग्रेस की कड़ी आलोचना की और कहा कि जाति एक ऐसा कारक है जिसने स्वतंत्रता के बाद पार्टी की नीति को प्रभावित किया है. उन्होंने कहा ‘तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने अपने संकीर्ण जातिवाद से प्रभावित होकर इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया और बाद में इसे टुकड़ों में पारित किया. इस प्रकार बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर को ओबीसी के लिए आरक्षण के अभाव और महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और बेहतरी के लिए कोई ठोस कदम न उठाए जाने के विरोध में देश के पहले कानून मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा’.

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