वॉशिंगटन। अमेरिका (US) में 3 नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनाव (Midterm election) राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के लिए बड़ी राजनीतिक परीक्षा माने जा रहे हैं। चुनाव के नतीजे तय करेंगे कि ट्रंप को अपने कार्यकाल के अगले दो वर्षों में अमेरिकी संसद का कितना समर्थन मिलेगा। यदि डेमोक्रेटिक पार्टी प्रतिनिधि सभा या सीनेट में बहुमत हासिल कर लेती है, तो ट्रंप प्रशासन की व्यापार, आव्रजन और विदेश नीति से जुड़ी योजनाओं पर संसदीय निगरानी बढ़ सकती है। इस चुनाव को भारत के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि इसके नतीजे दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों और भारतीय पेशेवरों से जुड़े वीजा नियमों को प्रभावित कर सकते हैं।
कांग्रेस के दोनों सदनों की सीटों पर मुकाबला
अमेरिका में मध्यावधि चुनाव के जरिए कांग्रेस के दोनों सदनों के सदस्यों का चुनाव होता है। निचले सदन प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की सभी 435 सीटों पर मतदान होना है। प्रतिनिधियों का कार्यकाल दो साल का होता है और राज्यों को जनसंख्या के आधार पर सीटें आवंटित की जाती हैं।
वहीं, ऊपरी सदन सीनेट में कुल 100 सीटें हैं। प्रत्येक राज्य को दो सीटें मिलती हैं और सीनेटरों का कार्यकाल छह साल का होता है। इस चुनाव में सीनेट की सभी सीटों पर नहीं, बल्कि निर्धारित हिस्से पर चुनाव होता है।
राष्ट्रपति के चुनाव के विपरीत, मध्यावधि चुनाव में राष्ट्रपति पद के लिए मतदान नहीं होता। हालांकि, इसके नतीजे राष्ट्रपति की राजनीतिक ताकत और नीतियों को लागू करने की क्षमता पर सीधा असर डाल सकते हैं।
36 राज्यों में गवर्नर भी चुने जाएंगे
इस बार 36 राज्यों में मतदाता अपने गवर्नर भी चुनेंगे। अमेरिका में गवर्नर का कार्यकाल आमतौर पर चार साल का होता है। राज्यों को गर्भपात कानून, शिक्षा और चुनावी प्रक्रिया जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर अपने कानून बनाने का अधिकार है। ऐसे में गवर्नर चुनाव के नतीजे भी अमेरिकी राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
निर्धारित चुनाव कार्यक्रम के अनुसार, मतदान के बाद शुरुआती रुझान और नतीजे सामने आने लगेंगे। भारतीय समयानुसार इन पर नजर रखने वालों को अमेरिकी राज्यों में मतदान के समय और मतगणना की प्रक्रिया का ध्यान रखना होगा।
भारत के लिए क्यों अहम है चुनाव?
अमेरिकी मध्यावधि चुनाव का असर भारत पर भी पड़ सकता है। अमेरिकी कांग्रेस के फैसले भारतीय निर्यात, द्विपक्षीय व्यापार और अमेरिका में काम कर रहे भारतीय पेशेवरों के हितों को प्रभावित कर सकते हैं।
व्यापार दोनों देशों के बीच प्रमुख मुद्दा है। फरवरी में भारत और अमेरिका ने अंतरिम व्यापार समझौते के ढांचे की घोषणा की थी। इसके तहत अमेरिकी पक्ष ने भारतीय वस्तुओं पर 18 प्रतिशत टैरिफ लागू करने की बात कही थी। हालांकि, उपलब्ध विवरण के अनुसार, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के टैरिफ संबंधी फैसले के बाद यह दर घटकर 10 प्रतिशत रह गई है।
यदि डेमोक्रेटिक पार्टी कांग्रेस के किसी एक या दोनों सदनों में बहुमत हासिल करती है, तो ट्रंप प्रशासन की व्यापार नीति पर सवाल उठ सकते हैं। इससे भारत-अमेरिका व्यापार समझौते और भारतीय उत्पादों पर शुल्क से जुड़े फैसलों की दिशा प्रभावित होने की संभावना रहेगी।
एच-1बी वीजा पर भी रहेगी नजर
अमेरिका में काम करने वाले भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए एच-1बी वीजा लंबे समय से संवेदनशील मुद्दा रहा है। ट्रंप प्रशासन ने एच-1बी वीजा के नए आवेदनों पर एक लाख डॉलर की फीस लगाने का प्रस्ताव दिया था। हालांकि, इस प्रस्ताव को दो अमेरिकी संघीय अदालतों ने प्रक्रियात्मक खामियों के आधार पर फिलहाल रोक दिया है।
यदि रिपब्लिकन पार्टी दोनों सदनों में अपना नियंत्रण बनाए रखती है, तो ट्रंप प्रशासन को अपनी आव्रजन नीतियों को आगे बढ़ाने में अपेक्षाकृत आसानी हो सकती है। दूसरी ओर, डेमोक्रेट्स को किसी एक सदन में भी बहुमत मिलने पर प्रशासन के फैसलों की जांच, सुनवाई और निगरानी बढ़ सकती है।
भारत के लिए भी यह चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण है कि वाशिंगटन में सत्ता संतुलन में बदलाव का असर टैरिफ, एच-1बी वीजा और द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों पर पड़ सकता है। हालांकि, चुनावी नतीजों के आधार पर किसी नीति में तत्काल बदलाव होगा, यह निश्चित नहीं है।
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