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अभी नहीं दिखा अल-नीनो का पूरा असर, आने वाले 5 महीने भारत के लिए बन सकते हैं चुनौतीपूर्ण

June 18, 2026

नई दिल्ली। भारत (India) में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून 2026 (Monsoon) जून की शुरुआत में केरल पहुंचा, हालांकि यह सामान्य से कुछ देर से हुआ। शुरुआती बारिश कई इलाकों में कमजोर रही है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि अल-नीनो (El nino) का पूरा असर अभी सामने नहीं आया है, लेकिन आने वाले जुलाई से नवंबर तक के महीने देश के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकते हैं।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने इस साल पूरे मॉनसून सीजन में सामान्य से कम बारिश का अनुमान जताया है, जो लगभग 90-92 प्रतिशत लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) के आसपास रह सकता है। इसका मतलब है कि देश के कई हिस्सों में सूखे जैसे हालात बनने की आशंका है, खासकर जून के बाद।

अल-नीनो क्या है और भारत पर इसका असर कैसे पड़ता है?
अल-नीनो एक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। सामान्य परिस्थितियों में इस क्षेत्र में ठंडा पानी रहता है और ट्रेड विंड्स पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं। लेकिन अल-नीनो के दौरान ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या दिशा बदल लेती हैं, जिससे भारत की ओर आने वाली नमी वाली हवाएं प्रभावित होती हैं।


  • इस स्थिति में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून कमजोर पड़ सकता है, जो भारत की सालाना बारिश का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा लाता है। बारिश कम होने पर कृषि, जल संसाधन, बिजली उत्पादन और अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर पड़ता है।

    2026 में वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अल-नीनो जून में कमजोर रहेगा, लेकिन जुलाई-अगस्त में यह मध्यम स्तर तक पहुंच सकता है और सितंबर तक इसके मजबूत होने की संभावना है। NOAA और IMD के अनुसार, इस अवधि में इसके विकसित होने की संभावना 80-90 प्रतिशत से अधिक बताई जा रही है।

    पिछले वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि अधिकांश अल-नीनो वर्षों में भारत में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है। 2009 में कमजोर अल-नीनो के बावजूद बारिश केवल 78 प्रतिशत रही थी, जो दशकों में सबसे कम स्तरों में से एक था। वहीं 2015-16 के मजबूत अल-नीनो में भी देश को सूखे जैसी स्थिति का सामना करना पड़ा था।

    हालांकि कुछ वर्षों में सकारात्मक भारतीय महासागर द्विध्रुव (IOD) ने अल-नीनो के असर को आंशिक रूप से कम किया, लेकिन 2026 में IOD फिलहाल न्यूट्रल स्थिति में है और बाद में इसके सकारात्मक होने की उम्मीद जताई जा रही है, जिससे कुछ राहत मिल सकती है।

    मॉनसून की शुरुआत कमजोर
    जून 2026 के पहले दो हफ्तों में कई राज्यों में बारिश सामान्य से काफी कम रही। महाराष्ट्र में 70-80 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई है, जबकि मध्य भारत और उत्तरी हिस्सों में भी बारिश कमजोर रही है। IMD का अनुमान है कि जून में भी बारिश औसत से कम रह सकती है। इससे खरीफ फसलों की बुवाई पर असर पड़ा है और किसानों की चिंता बढ़ी है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि अभी अल-नीनो का पूरा प्रभाव इसलिए नहीं दिखा है क्योंकि यह विकास की अवस्था में है। इसका वास्तविक असर जुलाई से सितंबर के बीच देखने को मिल सकता है, जब मॉनसून अपने चरम पर होता है। अगर यह मजबूत हुआ तो अगस्त-सितंबर में बारिश और घट सकती है, जिससे जलाशयों में पानी की कमी और भूजल स्तर गिरने जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।

    कृषि और अर्थव्यवस्था पर असर
    भारत की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर है। करीब आधी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती से जुड़ी है। खरीफ सीजन में धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालों जैसी फसलें बोई जाती हैं, जिनकी पैदावार कम बारिश से प्रभावित हो सकती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, यदि बारिश सामान्य से कम रही तो खाद्यान्न उत्पादन में 10-15 प्रतिशत तक गिरावट संभव है, जिससे खाद्य सुरक्षा और कीमतों पर असर पड़ सकता है। इससे सरकार को आयात बढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है और विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ सकता है।

    मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्य अधिक प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि यहां वर्षा आधारित खेती ज्यादा होती है।

    जल संकट और अन्य प्रभाव
    कम बारिश से देश में जल संकट गहरा सकता है। पेयजल, सिंचाई और औद्योगिक उपयोग के लिए पानी की कमी बढ़ने की आशंका है। इसके अलावा हाइड्रो पावर उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।

    गर्मी और लू की स्थिति भी गंभीर हो सकती है। अल-नीनो के दौरान तापमान बढ़ने की संभावना रहती है, जिससे स्वास्थ्य जोखिम खासकर बुजुर्गों, बच्चों और मजदूरों के लिए बढ़ सकते हैं।

    महंगाई और आर्थिक दबाव
    कृषि उत्पादन घटने से खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है। इससे महंगाई दर पर दबाव बढ़ेगा और आर्थिक विकास दर भी प्रभावित हो सकती है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका सीधा असर देखने को मिल सकता है।

    सरकार पहले से ही सूखा प्रबंधन और राहत योजनाओं की तैयारी कर रही है। कई जिलों में कंटिंजेंसी प्लान लागू किए जा रहे हैं और फसल बीमा योजनाओं को मजबूत किया जा रहा है, लेकिन चुनौतियां बनी हुई हैं।

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