
नई दिल्ली: जम्मू-कश्मीर के डोडा जिला (Doda District) की ऊंची और खूबसूरत पहाड़ियों के बीच स्थित धदकई गांव (Dhadkai Village) अपनी प्राकृतिक सुंदरता (natural beauty)के साथ-साथ एक अनोखी और चौंकाने वाली सच्चाई के लिए भी जाना जाता है। इस गांव को भारत का ‘साइलेंट विलेज’ (Silent Village) कहा जाता है, क्योंकि यहां रहने वाले लोगों का एक बड़ा हिस्सा न तो सुन सकता है और न ही बोल सकता है। यह स्थिति गांव की पहचान और जीवनशैली (Identity and Lifestyle)दोनों को पूरी तरह बदल चुकी है।
गांव की कुल आबादी लगभग दो हजार के आसपास है, लेकिन इनमें से 90 से अधिक लोग जन्म से ही मूक-बधिर हैं। यह संख्या किसी भी सामान्य गांव की तुलना में काफी अधिक है, जिसने लंबे समय से शोधकर्ताओं और स्वास्थ्य विशेषज्ञों को भी हैरान कर रखा है। यहां रहने वाले कई परिवार ऐसे हैं, जहां एक से अधिक सदस्य इस स्थिति से प्रभावित हैं।
धदकई गांव में रहने वाले लोग आपस में संवाद करने के लिए अपनी एक विशेष सांकेतिक भाषा का उपयोग करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि जो लोग सुन और बोल सकते हैं, वे भी इस स्थानीय संकेत भाषा को समझते हैं, जिससे पूरे गांव में संवाद की एक अलग लेकिन प्रभावी व्यवस्था विकसित हो चुकी है। इससे गांव में सामाजिक जीवन पूरी तरह रुकता नहीं, बल्कि एक अलग तरीके से चलता रहता है।
इस समस्या की शुरुआत को लेकर स्थानीय लोगों का मानना रहा है कि यह कई पीढ़ियों से चली आ रही है। शुरुआती मामलों का जिक्र 20वीं सदी की शुरुआत में मिलता है, जिसके बाद समय के साथ ऐसे मामलों में लगातार वृद्धि देखी गई। कुछ दशकों में मूक-बधिर लोगों की संख्या तेजी से बढ़ती गई, जिसने स्थिति को और गंभीर बना दिया।
लंबे समय तक इसे अंधविश्वास या किसी प्राकृतिक कारण से जोड़ा जाता रहा, लेकिन बाद में वैज्ञानिक जांच में इसके पीछे एक स्पष्ट जेनेटिक कारण सामने आया। शोधकर्ताओं के अनुसार यह स्थिति ‘जेनेटिक क्लस्टर’ या ‘फाउंडर्स इफेक्ट’ का परिणाम है, जिसमें एक सीमित आबादी के भीतर लगातार विवाह होने से आनुवंशिक दोष अगली पीढ़ियों में बढ़ता जाता है।
वैज्ञानिक अध्ययन में पाया गया कि इस समुदाय के लोगों में OTOF नामक जीन में गड़बड़ी पाई जाती है, जो कान से दिमाग तक ध्वनि संकेत पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब यह जीन माता और पिता दोनों से प्रभावित होता है, तो बच्चे जन्म से ही सुनने और बोलने की क्षमता से वंचित रह जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति को रोकने का सबसे प्रभावी तरीका सामाजिक जागरूकता और विवाह संबंधों में विविधता लाना है। इसके साथ ही जेनेटिक परीक्षण और जागरूकता कार्यक्रम भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं ताकि आने वाली पीढ़ियों को इस समस्या से बचाया जा सके।
हाल के वर्षों में कुछ सामाजिक संगठनों और संस्थाओं द्वारा यहां के लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने और उन्हें साइन लैंग्वेज के माध्यम से बेहतर संवाद कौशल सिखाने के प्रयास किए जा रहे हैं। ये प्रयास धीरे-धीरे गांव में सकारात्मक बदलाव की उम्मीद जगा रहे हैं, जिससे यहां के लोग भी बेहतर भविष्य की ओर देख रहे हैं।
धदकई गांव की यह कहानी केवल एक चिकित्सा स्थिति नहीं, बल्कि मानव जीवन, आनुवंशिकी और सामाजिक संरचना का एक अनोखा उदाहरण भी है, जो यह दिखाता है कि कैसे विज्ञान और जागरूकता मिलकर कठिन परिस्थितियों को बदल सकते हैं।
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved