
इंदौर। संजीव मालवीय
वार्ड 58 और 60 (Wards 58 and 60) में निर्वाचन आयोग (Election Commission) ने कलेक्टर (Collector) की रिपोर्ट के आधार पर चुनाव नहीं कराने की घोषणा कर दी। इसके पीछे सबसे ज्यादा राहत भाजपा को मिली है। भाजपा भी नहीं चाहती थी कि चुनाव हों और तो और दोनों वार्ड कांग्रेसी वार्ड हैं और यहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अधिक है। चुनाव होते तो भाजपा की जीत का गणित गड़बड़ा सकता था, वहीं एक सवाल यह भी खड़ा हुआ कि जब एसआईआर में वोटर लिस्ट में इतनी पारदर्शिता से काम हुआ है तो इन दोनों वार्डों में आखिर मतदाता सूची में गड़बड़ी कहां हो गई, जिसे चुनाव निरस्त होने का कारण बताया गया है।
वार्ड क्रमांक 60 में पहले ही कांग्रेस पार्षद सुनेहरा अंसारी कोर्ट से स्टे ले आई थी और यहां चुनाव पर रोक लग गई थी, वहीं बचे हुए वार्ड क्रमांक 58 में चुनाव कराने की पूरी तैयारी निर्वाचन आयोग ने कर ली थी और आज से नामांकन भरे जाने थे, लेकिन कल आयोग ने ही चुनाव निरस्त करने की घोषणा कर डाली। यहां से अनवर कादरी पार्षद थे, जिन्हें लव जिहाद में फंडिंग के आरोप के बाद उनकी पार्षदी निरस्त कर दी गई थी। चुनाव निरस्त करने के पीछे जिला प्रशासन और निर्वाचन अधिकारी कलेक्टर शिवम वर्मा ने मतदाता सूची में गड़बड़ी होने की बात कही है तो पुलिस प्रशासन ने अपने प्रतिवेदन में लिखा है कि यहां चुनाव कराने में गड़बड़ी हो सकती है और कानून व्यवस्था भी गड़बड़ा सकती है। इसके बाद चुनाव निरस्त करने का फैसला ले लिया गया। हालांकि सवाल उठता है कि पिछले साल ही इतनी बारीकी से मतदाता सूची का परीक्षण किया गया और एसआईआर प्रक्रिया के माध्यम से एक-एक मतदाता का सत्यापन किया गया तो मतदाता सूची में गड़बड़ी कहां से आ गई? यानी मतदाता सूची के पुनरीक्षण के बाद घोषित हुई अंतिम मतदाता सूची में गड़बड़ी हुई है तो ऐसा दूसरे वार्डों में भी हुआ होगा, वहीं कानून व्यवस्था की स्थिति बनने पर पुलिस प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए। ऐसा तो विधानसभा चुनाव में भी होता है। अगर ऐसा ही रहा तो ऐसे इलाकों में चुनाव ही नहीं हो पाए। दरअसल वार्ड क्रमांक 58 में आधे मुस्लिम और आधे हिन्दू मतदाता हैं, लेकिन यह वार्ड हर बार कांग्रेस ही जीतते आई है, क्योंकि हिन्दू मतदाताओं में कांग्रेस के भी मतदाता रहते हैं और वे ही जीत-हार का तय करते हैं। यहां से भाजपा को हर बार हार का सामना करना पड़ता है। अगर चुनाव होते भी तो भाजपा यहां से हार सकती थी और उससे मतदाताओं में गलत संदेश जाता जो अगले साल होने वाले नगर निगम चुनाव में भाजपा को लिए फायदेमंद साबित नहीं होता। यूं भी 6 महीने बाद चुनावी माहौल बनने लगेगा और अगर सबकुछ इसी तरह रहा तो आगामी मई-जून में नगरीय निकाय के चुनाव हो सकते हैं। इसी को लेकर अब कांग्रेस और भाजपा अब अगले साल के चुनाव की ही तैयारी कर रहे हैं। कांग्रेस ने तो उम्मीदवारों को ढूंढना शुरू कर दिया है तो भाजपा के पास भी उम़्मीदवारों की भरमार है।
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