नई दिल्ली। खालिस्तान समर्थक (Khalistan supporter) आतंकी नेटवर्क कथित तौर पर युवाओं को अपने जाल में फंसाने के लिए भर्ती का तरीका बदल रहे हैं। सुरक्षा एजेंसियों (Security agencies) के इनपुट के मुताबिक, अब ऐसे युवाओं को निशाना बनाया जा रहा है जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और जो सामान्य सामाजिक जीवन जी रहे हैं। सोशल मीडिया, ऑनलाइन संपर्क, वैचारिक प्रचार और आर्थिक लालच के जरिए उन्हें धीरे-धीरे नेटवर्क से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार पहले आतंकी नेटवर्क भर्ती के लिए ऐसे लोगों पर अधिक निर्भर रहते थे, जिनका अपराध की दुनिया से पहले से संपर्क रहा हो। लेकिन अब रणनीति में बदलाव देखा जा रहा है। सामान्य पृष्ठभूमि और साफ रिकॉर्ड वाले युवाओं को सोशल मीडिया और व्यक्तिगत संपर्कों के जरिए प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।
एजेंसियों के लिए यह इसलिए बड़ी चुनौती है क्योंकि ऐसे युवाओं पर शुरुआती स्तर पर संदेह करना अपेक्षाकृत मुश्किल होता है। सामान्य ऑनलाइन बातचीत या सोशल मीडिया गतिविधि से शुरू होने वाला संपर्क बाद में कट्टरपंथी विचारों और आपराधिक गतिविधियों तक पहुंच सकता है।
जांच एजेंसियों के इनपुट के मुताबिक, डिजिटल प्लेटफॉर्म इस पूरी रणनीति का अहम हिस्सा बन गए हैं। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए युवाओं तक वैचारिक या भड़काऊ सामग्री पहुंचाने के बाद व्यक्तिगत संपर्क स्थापित करने की कोशिश की जा सकती है।
कई मामलों में शुरुआत सामान्य बातचीत से होती है। इसके बाद कथित तौर पर विचारधारा, आर्थिक मदद या किसी खास उद्देश्य के नाम पर युवाओं को प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। एजेंसियों का मानना है कि विदेश में बैठे हैंडलर भी सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग के माध्यम से स्थानीय संपर्कों तक पहुंच बना सकते हैं।
सुरक्षा एजेंसियों की चिंता सिर्फ वैचारिक कट्टरता तक सीमित नहीं है। इनपुट के अनुसार, कुछ मामलों में युवाओं को आर्थिक फायदे का लालच देकर भी नेटवर्क से जोड़ने का प्रयास किया जा सकता है। पहले भरोसा कायम किया जाता है और उसके बाद उन्हें धीरे-धीरे ऐसी गतिविधियों में शामिल करने का खतरा रहता है, जिनका संबंध अपराध या आतंकी नेटवर्क से हो सकता है।
यही वजह है कि एजेंसियां ऑनलाइन कट्टरपंथीकरण को तेजी से उभरती चुनौती मान रही हैं।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) भी इंटरनेट के जरिए होने वाले कट्टरपंथीकरण को गंभीर सुरक्षा चुनौती मानती है। जांच के दौरान सामने आए मामलों में सोशल मीडिया पेजों और यूट्यूब चैनलों के जरिए युवाओं तक पहुंच बनाने की कोशिशों के आरोप सामने आते रहे हैं।
एजेंसियों के मुताबिक, डिजिटल प्लेटफॉर्म ने भर्ती प्रक्रिया को पहले की तुलना में ज्यादा विकेंद्रीकृत बना दिया है। विदेश में मौजूद हैंडलर और स्थानीय संपर्कों के बीच सीधे संबंध न होने की स्थिति में भी ऑनलाइन माध्यम से नेटवर्क तैयार किया जा सकता है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि बिना आपराधिक रिकॉर्ड वाला कोई व्यक्ति शुरुआत में सामान्य नागरिक की तरह दिखाई दे सकता है। यदि उसे ऑनलाइन प्रचार, व्यक्तिगत संपर्क या आर्थिक प्रलोभन के जरिए प्रभावित किया जाता है, तो उसकी गतिविधियों में बदलाव का पता लगाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
सुरक्षा एजेंसियां अब ऐसे मामलों में सोशल मीडिया आधारित कट्टरपंथीकरण, विदेश बैठे हैंडलरों के संपर्क और आतंकी-आपराधिक नेटवर्क के संभावित गठजोड़ पर विशेष नजर रख रही हैं। हालांकि किसी भी व्यक्ति को केवल सोशल मीडिया गतिविधि या विचारों के आधार पर आतंकी नेटवर्क से जुड़ा मानना उचित नहीं है; वास्तविक भूमिका की पुष्टि जांच और ठोस सबूतों के आधार पर ही की जाती है।
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