
कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (West Bengal Assembly Elections) में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में जारी अंदरूनी असंतोष अब संसद (Parliament) तक पहुंचता दिख रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पार्टी के 28 में से 19 लोकसभा सांसदों (Lok Sabha MP) के समर्थन का दावा करने वाला एक बागी गुट अलग राजनीतिक राह अपनाने की तैयारी में है।
सूत्रों के मुताबिक, यह बागी समूह सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष Om Birla से मुलाकात कर सकता है। इस दौरान वे अलग गुट के रूप में मान्यता देने और संसद में एनडीए खेमे के साथ बैठने की अनुमति देने की मांग रख सकते हैं।
‘असली टीएमसी’ का दावा
कूचबिहार से सांसद और इस बागी गुट के प्रमुख नेता जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया के हवाले से बताया गया है कि समूह खुद को “असली टीएमसी” के रूप में मान्यता दिलाने की मांग करेगा। उनका कहना है कि लोकसभा में वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार को नेता और शताब्दी रॉय को उपनेता बनाए जाने पर विचार किया जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, यह गुट पहले स्पीकर से मान्यता मिलने के बाद ही चुनाव आयोग (EC) का रुख करेगा। साथ ही, यह भी दावा किया गया है कि कुछ बागी सांसद एनडीए (NDA) खेमे के साथ बैठने की इच्छा जता रहे हैं।
ममता और नेतृत्व पर सवाल
बागी सांसदों ने पार्टी के भीतर असंतोष के पीछे नेतृत्व शैली को जिम्मेदार ठहराया है। उनका आरोप है कि राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में संगठनात्मक निर्णयों से असंतोष बढ़ा है। हालांकि ये आरोप राजनीतिक बयानबाजी पर आधारित हैं और स्वतंत्र रूप से इसकी पुष्टि नहीं हुई है।
बागी गुट का दावा है कि यदि उन्हें अपने क्षेत्र के विकास कार्यों को आगे बढ़ाना है, तो केंद्र सरकार के साथ बेहतर तालमेल जरूरी है, इसी कारण वे एनडीए के साथ जुड़ने की बात कर रहे हैं।
विधानसभा के बाद अब संसद में संकट
सूत्रों के अनुसार, पहले ही राज्य स्तर पर टीएमसी के भीतर असंतोष देखने को मिला था, जहां विधायकों के एक बड़े समूह ने अलग गुट बनाने की कोशिश की थी। अब यही स्थिति लोकसभा में भी सामने आती दिख रही है, जिससे पार्टी संगठन में गंभीर विभाजन की आशंका बढ़ गई है।
वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी भी सामने आई
पार्टी के भीतर असंतोष सिर्फ सांसदों तक सीमित नहीं है। वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी ने हाल ही में पार्टी बैठकों से दूरी बनाई है, जिसे संगठन के भीतर बढ़ती खींचतान का संकेत माना जा रहा है। इसके अलावा, कुछ अन्य वरिष्ठ नेताओं की ओर से भी नेतृत्व को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
हालांकि, टीएमसी की ओर से अब तक इस पूरे घटनाक्रम पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि यह बगावत आगे बढ़ती है, तो इसका असर पश्चिम बंगाल की राजनीति और संसद दोनों पर पड़ सकता है।
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