
नई दिल्ली. सोमवार से शुरू होने वाले संसद (Parliament) के मॉनसून सत्र (Monsoon Session) में शक्ति और सत्ता के नए समीकरण देखने को मिलेंगे. इस सत्र में ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) की टीएमसी (TMC) और उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) की शिवसेना (UBT) का संख्याबल लोकसभा में कम हो जाएगा. वहीं संसद में एकनाथ शिंदे की शिवसेना की ताकत में इजाफा होगा. एकनाथ शिंदे फिलहाल NDA के साथ हैं.
मॉनसून सत्र से पहले लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने शनिवार को छह शिवसेना (UBT) सांसदों के महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना में विलय को मंज़ूरी दे दी. साथ ही उन्होंने NCPI नाम की एक कम जानी-पहमानी पार्टी में शामिल हुए 20 बागी TMC सांसदों के लिए अलग बैठने की व्यवस्था की भी इजाज़त दे दी है. सरकारी सूत्रों ने बताया कि इन छह सांसदों के विलय के बाद शिवसेना के सांसदों की संख्या बढ़कर 13 हो गई है. पहले लोकसभा में शिंदे की पार्टी के 7 सांसद थे.
सोमवार से लोकसभा का सीटिंग अरेंजमेंट भी पूरी तरह से बदल जाएगा. TMC के 20 बागी सांसद अपनी मूल पार्टी से अलग बैठेंगे. बागी TMC सांसदों की ‘नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया’ (NCPI) का हिस्सा माने जाने की मांग पर अभी कोई अंतिम फ़ैसला नहीं लिया गया है और यह मामला अभी विचाराधीन है.
बता दें कि TMC और शिवसेना (UBT) ने बागी सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग की थी.
ममता से बगावत कर अलग गुट बने NCPI के लिए एक और अच्छी खबर है, इस पार्टी को संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजीजू ने रविवार होने वाली सर्वदलीय बैठक में शामिल होने के लिए अलग से न्योता दिया है. मॉनसून सत्र से पहले रविवार को संसद में सुबह 11 बजे सर्वदलीय बैठक होगी.
TMC के बागी सांसदों पर फैसला देने से पहले लोकसभा स्पीकर ने TMC के नेता अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल और पार्टी के अलग हुए गुट से मुलाकात की थी. शिवसेना (UBT) के मामले में भी ऐसी ही प्रक्रिया अपनाई गई थी.
सूत्रों के मुताबिक संसद के कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञों से सलाह-मशविरा किया गया और उन्होंने स्पीकर को अंतिम निर्णय लेने में मदद के लिए अपनी राय दी. सूत्रों ने बताया कि “सोच-समझकर और कानूनी रूप से सही” निर्णय लेने से पहले पिछली मिसालों और इसी तरह की स्थितियों में लोकसभा के पूर्व स्पीकरों और राज्यसभा के सभापतियों द्वारा लिए गए निर्णयों की भी समीक्षा की गई; साथ ही संवैधानिक और कानूनी पहलुओं पर भी गौर किया गया.
DMK भी कांग्रेस अलग बैठना चाहती है
TMC और शिवसेना (UBT) के बागी गुटों के अलावा, DMK ने भी कांग्रेस से अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की है. यह मांग तब की गई जब मुख्य विपक्षी पार्टी ने तमिलनाडु की इस पार्टी के साथ दशकों पुराना गठबंधन तोड़ दिया और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की पार्टी TVK के साथ हाथ मिला लिया.
स्पीकर द्वारा इस मांग को भी स्वीकार किए जाने की संभावना है. यदि इस मांग को भी मंजूरी मिलती है, तो मॉनसून सत्र में विपक्षी खेमे की तस्वीर पहले से काफी अलग दिखाई देगी.
TMC का हिसाब समझें
2024 के आम चुनाव में TMC के टिकट पर कुल 29 सांसद लोकसभा के लिए चुने गए थे.
इनमें से 20 सांसद पार्टी से अलग हो गए और NCPI में शामिल हो गए. NCPI पश्चिम बंगाल के हावड़ा में स्थित एक रजिस्टर्ड लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी है. बागी गुट ने नरेंद्र मोदी सरकार के प्रति अपना समर्थन और सत्ताधारी NDA में शामिल होने की इच्छा भी ज़ाहिर की है. सुदीप बंदोपाध्याय, काकोली घोष, सयानी घोष, यूसुफ पठान, शताब्दी रॉय, माला रॉय जैसे सांसद इस गुट में शामिल हैं.
लोकसभा सचिवालय के फैसले का सबसे बड़ा असर विपक्षी राजनीति पर पड़ने वाला है. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पहले ही अपने कई सांसदों की नाराजगी से जूझ रही थी. अब इन सांसदों को अलग पहचान मिलने के बाद संसद में TMC की संख्या तो कम होगी ही, पार्टी के प्रभाव पर भी असर पड़ेगा.
ममता बनर्जी विधानसभा चुनाव हार के बाद भाजपा के खिलाफ एकजुटता का संदेश देने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन इस घटनाक्रम ने उस दावे को कमजोर किया है.
उद्धव की भी ताकत घटी
अगर उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना (UBT) की बात करें तो पार्टी के टिकट पर कुल नौ सांसद चुने गए थे, जिनमें से छह महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली प्रतिद्वंद्वी शिवसेना में शामिल हो गए हैं.
ये सांसद हैं
संजय दीना पाटिल – मुंबई नॉर्थ ईस्ट
संजय जाधव – परभणी
संजय देशमुख – यवतमाल-वाशिम
भाऊसाहेब वाकचौरे – शिर्डी
नागेश पाटिल अष्टीकर – हिंगोली
ओमप्रकाश राजे निंबालकर- धाराशिव
अब तीन सांसद (अरविंद सावंत, अनिल देसाई, राजाभाऊ) ही शिवसेना (UBT) में बचे हैं.
TMC और शिवसेना (UBT) दोनों ने स्पीकर के सामने तर्क दिया कि उनके बागी सांसदों को अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए क्योंकि दल-बदल विरोधी कानून के तहत यह मामला आता है. दोनों पार्टियों ने तर्क दिया कि दल-बदल विरोधी कानून तभी लागू नहीं होता जब पूरी पार्टी के दो-तिहाई सदस्य पार्टी छोड़ दें.
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