नई दिल्ली। भारत ने सिंधु जल संधि (India Indus Waters Treaty) को लेकर अपना रुख और स्पष्ट कर दिया है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि मौजूदा स्वरूप में इस संधि को दोबारा लागू करने का सवाल फिलहाल नहीं उठता। भविष्य में यदि इस दिशा में कोई पहल होती भी है तो वह नई शर्तों और नए ढांचे के तहत होगी। इसके लिए पाकिस्तान (Pakistan) को सबसे पहले सीमा पार आतंकवाद पर स्थायी और भरोसेमंद कार्रवाई करनी होगी।
सूत्रों के मुताबिक, जब तक पाकिस्तान आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन देना बंद नहीं करता और इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाता, तब तक दोनों देशों के बीच जल सहयोग को पहले जैसी स्थिति में बहाल नहीं किया जाएगा।
सरकारी सूत्रों ने संकेत दिया है कि भविष्य में यदि सिंधु जल संधि से जुड़े प्रावधानों को फिर से लागू करने पर विचार किया जाता है तो उसके लिए नए सिरे से बातचीत होगी। यह प्रक्रिया मौजूदा समझौते की पुनर्बहाली नहीं बल्कि एक नए ढांचे के निर्माण पर आधारित होगी।
उनका कहना है कि किसी भी नए समझौते की आधारशिला आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान की विश्वसनीय कार्रवाई होगी।
सूत्रों ने पाकिस्तान के उन आरोपों को भी खारिज किया, जिनमें कहा जा रहा है कि भारत द्वारा संधि स्थगित किए जाने से वहां जल संकट पैदा हुआ है। उनका कहना है कि पाकिस्तान की समस्या भारत नहीं, बल्कि उसकी अपनी जल प्रबंधन व्यवस्था है।
सरकारी आकलन के अनुसार पाकिस्तान में पर्याप्त जल भंडारण क्षमता का अभाव, नहरों में भारी रिसाव और प्रांतों के बीच जल बंटवारे को लेकर विवाद बड़ी वजह हैं, जिनके कारण बड़ी मात्रा में पानी व्यर्थ चला जाता है।
सूत्रों के अनुसार, फिलहाल भारत सिंधु जल संधि से पूरी तरह अलग होने की दिशा में कोई सक्रिय कदम नहीं उठा रहा है। हालांकि, एक संप्रभु राष्ट्र होने के नाते उसके पास ऐसी किसी भी संधि की समीक्षा या उसे समाप्त करने का अधिकार सुरक्षित है, यदि वह उसके राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल हो।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि आगे की स्थिति काफी हद तक पाकिस्तान के व्यवहार और उसके कदमों पर निर्भर करेगी।
सरकार का मानना है कि पिछले वर्ष अप्रैल में पहलगाम आतंकी हमले में 26 नागरिकों की मौत के बाद भारत ने अपने सुरक्षा और कूटनीतिक दृष्टिकोण की व्यापक समीक्षा की थी। उसी क्रम में सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला भी लिया गया।
भारतीय एजेंसियों के अनुसार इस हमले में पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े संगठन ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ (टीआरएफ) की भूमिका सामने आई थी। इसके बाद भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत पाकिस्तान में आतंकी ढांचे पर कार्रवाई की थी।
सूत्रों ने कहा कि हाल के महीनों में पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व की ओर से भारत के खिलाफ उकसावे वाले बयान लगातार बढ़े हैं। इनमें परमाणु हथियारों के इस्तेमाल और सिंधु जल संधि से जुड़े मुद्दों को लेकर युद्ध जैसी चेतावनियां भी शामिल रही हैं।
सरकार का मानना है कि ऐसे माहौल में विश्वास बहाली की प्रक्रिया और अधिक कठिन हो गई है।
सिंधु जल संधि पर 19 सितंबर 1960 को भारत और पाकिस्तान ने विश्व बैंक की मध्यस्थता में हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते के तहत रावी, ब्यास और सतलुज नदियों का उपयोग भारत को मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब का अधिकांश जल पाकिस्तान के हिस्से में गया।
संधि के अनुसार भारत को पश्चिमी नदियों पर निर्धारित शर्तों के तहत रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाएं विकसित करने की अनुमति है, जिनमें किशनगंगा और रतले जैसी परियोजनाएं शामिल हैं।
सूत्रों ने बताया कि किशनगंगा और रतले परियोजनाओं को लेकर पाकिस्तान ने पहले तटस्थ विशेषज्ञ की नियुक्ति की मांग की थी, लेकिन बाद में उसने मध्यस्थता न्यायालय का रास्ता अपनाया। वर्ष 2016 में विश्व बैंक द्वारा दोनों प्रक्रियाएं समानांतर शुरू किए जाने पर भारत ने आपत्ति जताई थी।
भारत का लगातार यह रुख रहा है कि संधि में विवाद समाधान के लिए तय क्रमबद्ध प्रक्रिया का ही पालन होना चाहिए और एक ही मामले में दो समानांतर प्रक्रियाएं स्वीकार्य नहीं हैं।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि भारत को अब तक ऐसा कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं मिला है जिससे यह लगे कि पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद समाप्त करने के लिए गंभीर प्रयास कर रहा है।
उन्होंने दावा किया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1267 प्रतिबंध समिति द्वारा सूचीबद्ध व्यक्ति और संगठन अब भी पाकिस्तान में सार्वजनिक गतिविधियों में शामिल होते दिखाई देते हैं। इसके अलावा नियंत्रण रेखा के पार आतंकी गतिविधियों को लेकर सुरक्षा एजेंसियों के पास भी लगातार इनपुट मिल रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि के तहत सहयोग बढ़ाने के बजाय भारत की जलविद्युत परियोजनाओं में लगातार आपत्तियां उठाईं। सलाल, तुलबुल, बगलिहार, किशनगंगा, रतले, पाकल दुल जैसी बड़ी परियोजनाओं के अलावा दूरदराज के क्षेत्रों के लिए बनाई गई छोटी जलविद्युत योजनाओं का भी उसने विरोध किया।
सरकार का कहना है कि पाकिस्तान ने कई बार संधि की विवाद समाधान व्यवस्था का उपयोग वास्तविक समाधान के बजाय भारत की विकास परियोजनाओं में देरी कराने और उन्हें बाधित करने के लिए किया।
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