
इंदौर। इतने सालों तक प्राधिकरण अपने बेशकीमती 60 हजार स्क्वेयर फीट के भूखंड को वापस हासिल करने के मामले में सोया पड़ा था। अग्रिबाण द्वारा इस पूरे मामले का भंडाफोड़ करने के बाद प्राधिकरण सीईओ ने भी तत्परता दिखाई और भूखंड आबंटन के साथ नगर निगम की विकास अनुज्ञा को भी निरस्त करवाने की प्रक्रिया शुरू की। 150 करोड़ रुपए से अधिक कीमत के इस भूखंड को कौडिय़ों के दाम प्राधिकरण ने निजी बिल्डर को सौंप डाला, जिसमें शासन से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के दिशा-निर्देशों की धज्जियां उड़ाई गई और निगम को भी अंधेरे में रख भवन अनुज्ञा हासिल कर मौके पर अवैध निर्माण भी शुरू कर डाला। प्राधिकरण सीईओ डॉ. परीक्षित झाड़े ने इस मामले में निगमायुक्त को पत्र लिखा, जिसमें उक्त विवादित भूखंड पर जारी की गई विकास अनुज्ञा का परीक्षण करने और चल रहे अनुचित निर्माण कार्य को रोकने का अनुरोध किया गया। अब निगम द्वारा भी प्राधिकरण की अनुमति के बिना स्वीकृत कराए गए नक्शे पर कार्रवाई करने की तैयारी में है।
स्नेहलतागंज स्थित इस भूखंड के आवंटन से लेकर अब तक बड़े-बड़े खेल होते रहे। वर्ष 1994 में उक्त भूखंड का आवंटन किया गया और आवंटन के तत्काल बाद लीजगृहिता पचौरवाला बिल्डर ने एक साल की लीज राशि जमा कर दी, लेकिन पूर्ण भुगतान करने में 13 साल लगा दिए और तब तक प्राधिकरण ने कोई कार्रवाई नहीं करते हुए भूखंड की लीज डीड रजिस्टर्ड करा डाली। हद तो तब हो गई कि जब 1994 में आवंटित भूखंड की लीज अवधि 2007 से 2037 बताई गई और उसके लिए तर्क दिए गए कि लीजगृहिता ने 2007 में भूखंड का कब्जा लिया, जबकि प्राधिकरण ने जिस दिन भूखंड खरीदा था, उसी दिन उसे कब्जा मिल गया था। इस भूखंड पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार स्नेहलतागंज की इस जमीन पर सिर्फ प्रसूति गृह का निर्माण ही हो सकता था, लेकिन प्राधिकरण ने अपने स्तर पर मात्र 20 फीसदी हिस्से में ही प्रसूति गृह का प्रावधान कर और शेष 80 फीसदी में आवासीय ब्लॉकों की मंजूरी करवा डाली।
कई वर्षों तक इस भूखंड पर कोई गतिविधि नहीं हुई और प्राधिकरण भी सोया रहा, जबकि तत्कालिन अधिकारियों को भूखंड की लीज निरस्त कर उसका कब्जा लेकर नए सिरे से टेंडर के जरिए बेचने की प्रक्रिया करना थी, इससे प्राधिकरण को भी करोड़ों का फायदा होता और ये राशि शहर विकास के कार्यों में खर्च होती. लेकिन आवंटन के 34 वर्ष बाद आवंटिती ने मौके पर निर्माण शुरू कर दिया और निगम को भी अंधेरे में रख अनुमति हासिल कर ली. नतीजतन अग्निबाण ने फिर से इस मामले को पब्लिक डोमेन में लाने और प्राधिकरण को जगाने का काम किया. जिसके चलते अब वर्तमान सीईओ डॉ. परीक्षित झाड़े ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए निगमायुक्त को विस्तृत पत्र लिखा, जिसमें कहा गया कि योजना 99 स्नेहलतागंज स्थित चिकित्सालय एवं आवासीय उपयोग के बहुमंजिला ब्लॉक के लिए जारी की गई विकास अनुज्ञा का परीक्षण करते हुए मौके पर चल रहे अवैध निर्माण को रूकवाया जाए।
प्राधिकरण सीईओ ने अपने पत्र क्रमांक 2183 , दिनांक 20 /5 / 2026 के जरिए यह भी स्पष्ट कहा कि प्राप्त दस्तावेजों के मुताबिक भूखंड, जिसका क्षेत्रफल 5483.11 वर्ग मीटर यानी लगभग 60 हजार स्क्वेयर फीट का आधिपत्य 18.07.2007 को सौंपा गया। उक्त भूखंड लीज पर आबंटित होकर लीज डीड की सभी शर्तें आबंटित पर बंधनकारी है, जिसमें शर्त क्रमांक 9,15, 23, 24 और 25 का भी खुलासा सीईओ द्वारा किया गया, जिसमें शर्त क्रमांक 15 के मुताबिक भूखंड आधिपत्य दिनांक से 4 वर्ष के भीतर मानचित्र और निर्धारित अनुज्ञा प्राप्त कर निर्माण कार्य करना अनिवार्य रहेगा और इसका पालन ना करने पर प्राधिकारी को भूखंड का आबंटन निरस्त कर पुन: प्रवेश का अधिकार रहेगा। मगर आबंटिती पचोरवाला बिल्डर्स एवं डवलपर्स ने 18.07.2007 को आधिपत्य हासिल कर लिया और 19 साल बाद भी निर्माण नहीं किया, जिससे शर्तों का स्पष्ट उल्लंघन पाया गया।
मध्यप्रदेश विकास प्राधिकरणों की सम्पत्तियों का प्रबंधन और व्ययन नियम 2018 और संशोधित नियम 2021 के प्रभावशील होने और नियम 23 के तहत पट्टे की अवधि से 10 वर्ष की समयावधि में न्यूनतम निर्माण कार्य प्रारंभ नहीं करने पर प्राधिकरण को नियम 22 के अनुसार पट्टा निरस्त कर पुन: प्रवेश का अधिकार है। यानी प्राधिकरण भंडारी मिल प्रसूति गृह की जो जमीन पचोरवाला बिल्डर्स एवं डवलपर्स को आबंटित की गई उसकी लीज निरस्त कर पुन: कब्जा ले सकेगा। पूर्व में प्राधिकरण ने ऐसे कई भूखंडों की लीज शर्तों का उल्लंघन होने पर निरस्त की है। सीईओ डॉ. झाड़े के मुताबिक प्राधिकरण अपने स्तर पर तो इस मामले में उचित कार्रवाई कर ही रहा है, साथ ही निगमायुक्त को भी जानकारी दी गई है कि उक्त भूखंड पर जारी की गई विकास अनुज्ञा का परीक्षण करते हुए मौके पर चल रहे अनुचित निर्माण कार्य को रोके जाने के संबंध में भी आदेश जारी करे। यानी भंडारी प्रसूति गृह के इस भू-घोटाले में अब प्राधिकरण के साथ-साथ नगर निगम ने भी अपनी जांच और उसके बाद कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी है। प्राधिकरण सीईओ ने अपने इस पत्र में एक और महत्वपूर्ण बात ये भी कही कि उक्त भूखंड का स्वामी प्राधिकरण है, जबकि पचोरवाला बिल्डर केवल लीजगृहिता, ऐसे में उसे लीज डीड की शर्तों के अनुसार निर्माण करना होगा, लेकिन उसने शर्तों को छुपाकर निगम से अनुमति प्राप्त कर ली और निर्धारित शर्तों को ताक पर रख मौके पर मनमाना निर्माण करने का प्रयास किया।
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved